भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

केन्तु किञ्चिद्व्यवच्छेदादिति । अन्यथा शरीरजन्यत्वमिव अकर्तृकत्वे व्यक्त- प्रसिद्धौ पर्यवस्येदिति । किञ्च—आभासे व्यतिरेकिणि पक्षधर्महेतौ जीवच्छरीरं पृथिव्याद्यष्टद्रव्या- तिरिक्तानेकद्रव्यवत्, प्राणादिमत्त्वादित्यादौ कथमिदमुपाधिलक्षणं व्यवस्थाप्यम् । न ह्याभासे व्यतिरेक्यनुमानात्मनि यत्साध्यं तदुपाधिना व्याप्तमिष्यते, तस्य पराभिमतस्य क्वचित् सिद्ध्यापत्तेः । व्यतिरेकयोर्व्याप्तावुपाधिश्चेत्, तर्हि व्यतिरेके यद्व्याप्यं तस्य व्याप्य उपाधि- र्वश्यं मन्तव्यः । अन्यथोपाधेरन्वये साध्यान्वयापत्तिरिति उपाधिव्यतिरेकव्याप्त्य- वश्यम्भावस्य अभ्युपगम्यतया उपाधेर्यद्व्यापकं तद्व्यतिरेक उपाधिव्यतिरेक य रादिकं कर्तृजन्यं शरीराजन्यत्वात्' इस स्थल में शरीररूप विशेषण के व्यवच्छेदक न होने से व्याप्यत्वासिद्धि होती है, वैसे ही 'मैत्रतनयत्वम् , श्यामत्वव्यभिचारि, मैत्रतनय- त्वावच्छिन्नश्यामत्वव्यापक-शाकपाकजत्वव्यभिचारित्वात्' इस उपाधिव्यभिचार से साध्य- व्यभिचार के अनुमितिस्थल में भी हेतुदल में मैत्रतनयत्वरूप विशेषण के व्यवच्छेदक न होने से व्याप्यत्वासिद्धि हो जायगी । किञ्च—केवलव्यतिरेकी हेत्वाभास में जहाँ पक्ष में हेतु है, वहाँ अर्थात् 'जीवच्छरीरं पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्तानेकद्रव्यवत् प्राणादिमत्त्वात्' इस स्थल में इस लक्षण की व्यवस्था कैसे होगी । अर्थात् वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । केवल व्यतिरेकी आभास में जो साध्य है, वह उपाधि ( भोगायतनत्व ) से व्याप्त नहीं है, कारण ऐसा मानने पर पराभिमत साध्य की कहीं ( पक्ष या सपक्ष में ) सिद्धि हो ही जायगी । अर्थात् यदि पक्ष से व्यतिरिक्त स्थल में साध्य में उपाधि-व्याप्यत्व कहें, तो सपक्ष प्रसिद्ध हो जाने से केवल- व्यतिरेकित्व का व्याघात हो जायगा । यदि पक्ष में मानें, तो वहाँ हेतु के रहने से फिर व्यभिचार ही नहीं दिया जा सकेगा । एवञ्च वह सत्-हेतु होने लगेगा । समर्थन—व्यतिरेकी हेत्वाभास में व्यतिरेकव्याप्ति में ही उपाधि होती है, अन्वय में नहीं । अतः उपाधि के व्याप्त होने से साध्य की कहीं सिद्धि नहीं हो सकती । खंडन—व्यतिरेकव्याप्ति भी 'यत्र यत्र पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्तानेकद्रव्यत्वं नास्ति, तत्र तत्र प्राणादिमत्त्वं नास्ति' यही है । उसमें पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्तानेक- द्रव्यत्वस्वरूप साध्य का जो अभाव है, उसका व्याप्य अभोगायतनत्वरूप उपाधि है—ऐसा अवश्य बोलना होगा । अन्यथा यदि उपाधि को साध्याभाव का व्याप्य न मानें, तो