भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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[परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २८१

ध्येयत्वात् । न च पुरुषश्यामत्वेन व्याप्तिः । हेतुपक्षधर्मतयैव हि साध्यं पक्षधर्मः सिद्ध्यति न व्याप्त्या, अन्यथा पुरुषपदस्य व्यवच्छेदकस्याविशेषणत्वापातात् । परम्परासम्बन्धिकज्जलादिलेपश्यामत्वव्यवच्छेदकत्वे च संयुक्तश्यामपुरुष- समवेतश्यामत्वस्य परम्परासम्बन्धिनः कथं व्यवच्छेदः स्यात् । न च साध्यसाधनसम्बन्धादृष्टव्यभिचारत्वं साध्यव्यापकत्वं मारूपसाक्षात्कृति- करणादेस्तैजसादित्वे साध्ये भूद्भूतरूपवत्त्वादेरुपाधित्वम् । साधनेनापि च विशेषणतया निवेश्येन यदि केवलसाध्यव्यापकं व्यवच्छेद्यम्, तदा तस्य व्यभिचारशङ्काधानक्षमस्याप्युपाधित्वं न स्यात् । अथ न किञ्चिद्व्यव- च्छेद्यं तदा विशेषणत्वासिद्धिरेव । न हि प्रयोजनमात्राद्विशेषणमर्थवद् भवति, नहीं, कारण मैत्रतनयत्वरूप हेतु पक्ष का धर्म है, इसीसे पक्षभूत मैत्रतनयरूप पुरुष में साध्य की सिद्धि होने से साध्यत्व का पुरुष-श्यामत्व में पर्यवसान है, व्याप्ति के बल से नहीं । अन्यथा (यदि पुरुष-श्यामत्वरूप से व्याप्ति मानें, तो) 'मैत्रतनयः पुरुषश्यामः मित्रातनयत्वात्' इत्यादि पञ्चावयव होने से साध्यदल में पुरुषीयत्व के निवेश का [ व्यव- च्छेद्य न होने से ] वैयर्थ्य हो जायगा । समर्थन--कज्जल-लेप से जात श्यामत्व की व्यावृत्ति के लिए पुरुषीयत्व का निवेश है । खंडन—यदि ऐसा हो, तो संयुक्त पुरुषनिष्ठ श्यामत्व की परम्परासम्बन्ध से व्यावृत्ति के लिए भी विशेषण देना चाहिए । समर्थन---साध्य-साधनसम्बन्ध का व्यभिचार जिसमें दृष्ट न हो, वह साध्यव्यापक है । शाकपाकजत्व श्यामत्व और मैत्रतनयत्व के सम्बन्ध का व्यापक है, अतः दोष नहीं । खंडन—ऐसा मानने पर 'चक्षुः तैजसम्, साक्षात्कृतिकरणत्वात्' इस सत्-अनुमिति में उद्भूतरूपवत्त्व उपाधि हो जायगी । कारण तैजसत्व और साक्षात्कृतिकरणत्व दोनों के सम्बन्ध का व्यापक उद्भूतरूपवत्त्व है । किञ्च—'साध्य-साधनसम्बन्ध का व्यापक' यहाँ सम्बन्ध द्वारा जो साधन का निवेश है, उससे केवल साध्यव्यापक का व्यवच्छेद होता है या नहीं ? यदि होता है, तो 'अध्वरे पश्वालम्भः अधर्मसाधनं हिंसावत्' इस स्थल में निषिद्धत्व केवल अधर्मसाधनत्वरूप साध्य का व्यापक होने से उपाधि न होगी । यदि केवल साध्यव्यापक का व्यवच्छेद नहीं होता, तो विशेषण व्यर्थ हो जायगा । कारण=केवल प्रयोजन होने से विशेषण सफल नहीं होता, किन्तु किसीका व्यवच्छेद होने से ही सफल होता है। अन्यथा जैसे 'क्षित्यङ्कु- ३६