भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

यत्र प्रत्यक्षेणोपाधिनिश्चयस्तदेव तद्दर्शनस्थानं भविष्यतीति चेन्न । ऐन्द्रियकबाधे तज्जातीयस्य अतीन्द्रियस्याप्रयोजकीक्रियमाणेन हेतुनैव साधयितुं शक्यत्वात् । न च यदेकत्रैकजातीयमैन्द्रियकं तदन्यत्रैन्द्रियकबाधे हेतुबलादतीन्द्रियं न प्रसाध्येत, पाकदर्शनात् जठरानलादि । साधनाव्यापकत्वे सति साध्यव्यापक इति च न शाकाद्याहारपरिणतिपर- म्परासाध्यं व्याप्नोतीत्यव्यापकतादोषः । न हि शाकादित्वं नाम किञ्चिदेकमस्ति, यत्साध्यं व्याप्नुयात् । अस्तु वा कथमपि, तथापि श्यामत्वं न व्याप्नोति, इन्द्रनीलशिलादि- श्यामत्वस्य आहारजन्यत्वात् । शरीरश्यामत्वं साध्यम्, तच्च व्याप्नोत्येवेदमिति चेन्न । व्याप्तावुपाधेरभि- समर्थन—वह्नि से धूम के साधनस्थल में जहाँ साधनभूत वह्नि के अधिकरण अयो- गोलक में आर्द्रेन्धनसंयोग न होने से उसमें धूमरूप साध्य का व्यापकत्व तथा वह्निरूप साधन का अव्यापकत्व प्रत्यक्ष है, वहाँ निश्चित उपाधि है । खंडन—यद्यपि अयोगोलक में आर्द्रेन्धन संयोग का ऐन्द्रियक ( चाक्षुष ) बाध है; तथापि आर्द्रेन्धनजातीय अतीन्द्रिय आर्द्रेन्धनसंयोग की अनुमिति तो उसी वह्नि हेतु से हो सकती है, जिस हेतु को आप सोपाधिक बनाते हैं । जिसका एक स्थल में प्रत्यक्ष होता हो, उसका अन्य स्थल में प्रत्यक्ष-बाध होने पर भी हेतु के बल पर अतीन्द्रियत्व सिद्ध हो ही सकता है । जैसे— पाक से जाठर अग्नि । किञ्च—'साध्य की व्यापक होकर जो साधन की अव्यापक हो, वह उपाधि है' इस उपाधि-लक्षण में शाकाद्याहार-परिणतिपरम्परास्वरूप उपाधि श्यामत्वरूप साध्य की व्यापक नहीं है, अतः लक्षण में अव्याप्ति दोष है । साथ ही शाकादि एक अनुगत भी नहीं हैं, जो साध्य के व्यापक हों । किसी प्रकार शाकादि को अनुगत मान लें, तो भी वह श्यामत्व का व्यापक नहीं है, कारण इन्द्रनीलशिला का श्यामत्व आहारजन्य नहीं है । समर्थन—यहाँ यद्यपि साध्यत्व श्यामत्वरूप से है, तथापि उसका पर्यवसान पुरुषगत श्यामत्व में ही है और उसका व्यापक शाकपाकजत्व है ही । खण्डन—व्याप्ति में उपाधि होती है, अतः जिसकी जिस रूप से जिसमें व्याप्ति हो, उपाधि में उसी रूप से साध्य का व्यापकत्व तथा साधन का अव्यापकत्व होना चाहिए । प्रकृत में श्यामत्वरूप से व्याप्ति है । उसी रूप से उसे साध्य का व्यापक होना चाहिए । वह है