खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] पक्षता-लक्षण का खण्डनं २८३ व्याप्यतया मन्तव्य इति परसाध्यापत्तिः । असमव्याप्तिकयोरन्वयव्याप्तिसाध्य- साधनभाववैपरीत्येन व्यतिरेकव्याप्तेरिति । न च दोषान्तरमेव तर्हि वाच्यमिति वाच्यम् ; हेतोः पक्षधर्मत्वस्थितौ व्याप्तिच्युत्यर्थं त्वयोपाध्युपगमध्रौव्यात् । भवतु वा या काचिद् व्याप्तिर्नाम । तत्सत्त्व एवानुमितिभावात्, तस्याश्चानु- मितेश्च व्याप्तिरेष्टव्या, ततश्चाऽऽत्माश्रयः । तद्भेदे चाऽनुगमाविनिगमौ स्यातामिति । पक्षता-लक्षण-खण्डनम् व्याप्तिपक्षधर्मते अनुमिति भावयत इति वदन्ति । कश्चायं पक्षो नाम, यद्धर्मत्वं पक्षधर्मत्वम् ? अभोगायतनत्वरूप उपाधि के अन्वय में साध्य का अन्वय हो जायगा । एवञ्च उपाधि में व्यतिरेकव्याप्ति अवश्यम्भावी होने से उपाधि-व्यापक के व्यतिरेक को उपाधि-व्यतिरेक (भोगायतनत्व) का व्याप्य अवश्य मानना होगा। अतः पराभिमत साध्य की कहीं सिद्धि हो जायगी। असमव्याप्तिक व्याप्य-व्यापकस्थल में ('जीवच्छरीरम्, अष्टद्रव्यातिरिक्तनेक- द्रव्यवत् प्राणादिमत्त्वात्' इत्यादि स्थल में) अन्वयव्याप्ति में जो साध्य-साधनभाव है, व्यतिरेकव्याप्ति में उसके विपरीत साध्य-साधनभाव होता है। व्यतिरेकी हेत्वाभास में उपाधिरूप दोष नहीं, किन्तु अन्य ही दोष है, यह तो नहीं कह सकते। कारण हेतु के पक्ष में होने पर व्याप्ति की क्षति के लिए आपको उपाधि मानना ही पड़ेगी। इस तरह उपाधि का निरूपण संभव न होने से 'निरुपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिः' यह जो व्याप्ति का लक्षण करते थे, वह भी असिद्ध ही है। अस्तु, व्याप्ति कुछ भी हो; किन्तु उसके होने पर ही अनुमिति होती है। अतः अनुमिति के व्याप्तिजन्य होने तथा जन्यत्व के व्याप्तिघटित होने से व्याप्ति की व्याप्ति अनुमिति में अवश्य माननी होगी। वह यदि वही व्याप्ति हो, तो आत्माश्रय है। यदि भिन्न मानें, तो उस व्याप्ति की अनुमिति में भी अन्य व्याप्ति; इस प्रकार अनवस्था, अनेक व्याप्तियाँ होने से अननुगम तथा कौन-सी व्याप्ति अनुमिति का अङ्ग है, इसमें विनिगमक का अभाव हो जायगा। पक्षता-लक्षण का खण्डन कुछ आचार्य कहते हैं कि व्याप्ति और पक्षधर्मता, दोनों अनुमिति के कारण हैं। किन्तु उस पक्षधर्मता का घटक पक्ष क्या वस्तु है ?
२८४ सानुवादे खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
सिषाधयिषितधर्मा धर्मीति चेन्न । सिषाधयिषा हि प्रतिपिपादयिषा वा स्यात् प्रतिपित्सा वा ? आद्ये स्वार्थानुमित्यनुदयप्रसङ्गः । द्वितीये चासुरभिगन्धानुमेय- कुत्सितरसविषयस्वार्थानुमित्यनुदयप्रसङ्गः । न चानवधारितधर्मा धर्मी पक्षः । हेतुमत्तयाऽप्यनवधारणे अनुमानोदय- निदानभावासम्भवात् । अवधारणे चानवधारितधर्मत्वानुपपत्तेः । न चाऽनवधारितहेतुविषयधर्मा धर्मी पक्षः । तथाहि—केन अनवधारितधर्मा ? न तावदनुमानप्रयोक्त्रा, स्वयमज्ञाते परं प्रत्यप्रयोगात् । प्रतिवादिनेति चेन्न । प्रतिवादिविदिते ऽप्यर्थे वादितया परस्परविद्योत्कर्षापकर्षनिरूपणार्थमनुमानदर्शनात् । निर्वचन—जिस धर्मी में साध्यरूप धर्म की सिषाधयिषा हो, वह पक्ष है। खंडन— ‘सिषाधयिषा’ कथन की इच्छा है या ज्ञान की इच्छा ? यदि प्रथम पक्ष मानें, तो स्वार्था- नुमिति ही नहीं होगी । कारण स्वार्थानुमिति में पञ्चावयवात्मक प्रतिपादन की इच्छारूप पक्षता नहीं रहती और अनुमितिमात्र में पक्षधर्मता कारण है । द्वितीय पक्ष में ‘सटित- मांसं ( सड़ा मांस ) कुत्सितरसवत्, असुरभिगन्धवत्त्वात्’ यह स्वार्थानुमान नहीं कहलायेगा । कारण यहाँ प्रतिपित्सारूप पक्षता नहीं है । निर्वचन—जिस धर्मी का धर्म ज्ञात न हो, वह धर्मी पक्ष है । ‘पर्वतो वह्निमान् धूमात्’ इत्यादि स्थल में पर्वतरूप धर्मी का धर्म साध्यरूप वह्नि अज्ञात है । अतः पर्वत पक्ष हुआ । खण्डन—साध्य की तरह हेतु भी पक्ष-धर्म है । एवञ्च एतादृश पक्षता रहने पर अर्थात् हेतुमत्तया पक्ष का अवधारण न होने पर हेतुमत्तावगाहि परामर्श नहीं हो सकता, जो कि अनुमिति की उत्पत्ति का निदान या कारण है। यदि हेतुमत्तया अवधारण हो, तो उक्त परामर्श हो सकने पर भी उक्त पक्षता नहीं बनती । उभयथा अनुमिति न हो सकने से उक्त लक्षण असम्भवग्रस्त हो जायगा । समर्थन—‘हेतु का विषय ( व्यापक ) साध्यरूप धर्म जिस धर्मी में, अज्ञात हो वह पक्ष है’ ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च उपर्युक्त कोई दोष नहीं होगा । खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं; कारण किससे अज्ञात कहेंगे ? यदि न्यायप्रयोक्ता द्वारा अज्ञात कहें, तो परार्थानुमान में अनुमानप्रयोक्ता द्वारा पर्वत में वह्नि ज्ञात ही होने से वह पक्ष न कहलायेगा । स्वयं बिना जाने दूसरे के लिए प्रयोग ही नहीं हो सकता । यदि प्रतिवादी द्वारा अज्ञात कहें, तो भी युक्त नहीं । कारण प्रतिवादी द्वारा साध्य के ज्ञात होने पर भी परस्पर विद्योत्कर्ष के बाधनार्थ प्रतिवादी अनुमान का प्रयोग करते ही हैं ।
परिच्छेद ] पक्षता-लक्षण का खण्डन २८५ तथा अनवधारणं यत्किञ्चिद्धेतुविषयधर्मगोचरम्, वादिप्रयोक्तव्यहेतुविषय- गोचरं वा ? न तावदाद्यः ; अग्निमत्त्वनिश्चयदशायामपि तत्तद्धेतुविषयबहुतरापर- धर्मानवधारणात् धूमं प्रति पर्वतस्य पक्षत्वप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; तथापि तत्र प्रसङ्गात् । तद्धेतूनामपि वादिप्रयोज्यत्वात् । असाधारणविवक्षायाश्च अननुगमात्, इतरेतराश्रयदोषारच । पक्षधर्मत्वेन हेतुत्वनिरूपणात्, व्याप्तपक्षधर्मत्वस्य हेतुत्वात्, हेतुना च पक्षनिरूपणात् । स्वार्थानुमाने च हेतोरप्रयोज्यत्वात्, पक्षाभावेनानुमानानुदयप्रसङ्गात विरुद्ध- हेतौ पक्षस्याभासत्वप्रसङ्गात् । तत्र साध्यस्य तद्धेतुविषयत्वाभावात्, हेतोरेव च साध्य- विपरीतव्याप्त्या दुष्टत्वात् । एतेन सन्दिग्धसाध्यधर्मा धर्मी पक्षः ; साध्यस्त्वञ्च स्वपरार्थानुमानसाधारण- मुत्पाद्यज्ञानत्वमिति निरस्तम् । इसी तरह यत्किञ्चित् हेतुविषय धर्म का अनवधारण अपेक्षित है या वादिप्रयोक्तव्य हेतुविषय धर्म का अनवधारण ? प्रथम पक्ष में अग्नि का निश्चय होने पर भी तत्-तत् अन्य हेतुविषय बहुत-से धर्मों का अनिश्चय होने से धूम के प्रति पर्वत पक्ष हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण अग्नि की निश्चय दशा में भी वादिप्रयोक्तव्य धूमरूप हेतु के विषय श्यामत्व-प्रदेशवत्त्व आदि धर्मों का अज्ञान है ही । अथवा अन्य हेतु भी कदाचित् वादी से प्रयोक्तव्य है ही । यदि कहें कि 'वादिप्रयोक्तव्य धूमरूप हेतु के विषय वह्निरूप धर्म का अनवधारण जहाँ हो, वह पक्ष है,' तो साध्य-साधनभेद से पक्ष-लक्षण का भेद होने से लक्षण में अननुगम दोष हो जायगा । किञ्च—अन्योोन्याश्रय दोष भी होगा । कारण व्याप्ति-पक्षधर्मताविशिष्ट को ही हेतु कहते हैं, अतः पक्ष से हेतु का और हेतु से पक्ष का निरूपण है । किञ्च—स्वार्थानुमान में हेतु का प्रयोग भी नहीं होता, अतः पक्ष न होने से अनुमिति नहीं होगी । किञ्च—विरुद्ध हेतु में पक्षधर्मत्व का अभाव हो जायगा; कारण वहाँ साध्य हेतु का विषय ( व्यापक) नहीं होता, किन्तु साध्यभाव से व्याप्य होने से ही हेतु दुष्ट होता है । 'जहां साध्य का सन्देह हो, वह पक्ष है' और साध्य वही है, जो स्वार्थ-परार्थ अनुमिति-साधारण जायमान ज्ञान का विषय हो'—ऐसा कुछ लोग कहते थे । किन्तु
२८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
पक्षधर्मता-लक्षण-खण्डनम् भवतु वा यः कश्चन पक्षः, केयं पक्षधर्मता ? पक्षाश्रितेतेति चेन्न। नैयायिकादीन् प्रति प्रमेयत्वस्याहेतुत्वप्रसङ्गात्। विषय- विषयिभावस्य ज्ञेयज्ञानरूपातिरिक्तस्यानङ्गीकारात् । तयोश्च ज्ञेयाश्रितत्वायोगात् । प्रतीतिं व्याप्तिबलेन सामान्यतो व्यापकावगाहनप्रवृत्तां विशेषमादाय परं पर्यवसाययितुं व्याप्तस्य सामर्थ्यं सेति चेन्न। तस्याः सामान्यविषयायाः अनुप- पत्तेरसिद्धेर्व्याप्तिवत्सम्भवात् । अनुपपत्तित्वे व्याप्त्यनुप्रवेशात्, अधिकविषयाकाङ्क्षित्वे विरम्य व्याप्रा- रापत्तेः, मानान्तरत्वापत्तेर्वा । विशेषविषयायाश्च अनुपपत्तित्वेऽतिप्रसङ्गात् । इससे वह भी निरस्त हो गया, कारण सन्देह के विशेषणत्व या उपलक्षणत्व दोनों कल्पों में दोष कह आये हैं । किञ्च—'वादी का सन्देह या प्रतिवादी का ?' ऐसा विकल्प- कर पूर्वोक्त युक्ति से भी वह अयुक्त है । पक्षधर्मता-लक्षण का खण्डन अथवा छोड़ दें, पक्ष कुछ भी वस्तु हो, किन्तु यह पक्षधर्मता कौन-सी वस्तु है ? निर्वचन—पक्षमें आश्रितत्व ( वृत्तित्व ) ही पक्षधर्मता है । खण्डन—तब तो नैयायिक आदि के मत में प्रमेयत्व हेतु न कहलायेगा । कारण नैयायिक विषय-विषयी- भावरूप प्रमेयत्व को ज्ञेय और ज्ञान के स्वरूप से अतिरिक्त नहीं मानते । पक्षरूप ज्ञेय, ज्ञान प्रमेय के आश्रित नहीं, आत्मादि-आश्रित हैं । निर्वचन—व्याप्ति के बल सामान्यरूप से व्यापक को विषय करनेवाली प्रतीति को विशेष में पर्यवसित ( निराकाङ्क्ष ) करनेवाली जो व्याप्य की सामर्थ्य है, वह पक्षधर्मता है ।' खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं है । कारण सामान्य- विषयक प्रतीति विशेष की प्रतीति के बिना अनुपपन्न ही नहीं है; क्योंकि जैसे 'जो-जो धूमवान् है वह-वह वह्निमान् है' यह सामान्यविषयक व्याप्तिज्ञान विशेष की प्रतीति के बिना ही होता है । इसी तरह अनुमिति भी विशेष की प्रतीति के बिना ही होगी । यदि विशेष की प्रतीति के बिना सामान्य की प्रतीति को अनुपपन्न मानें, तो व्याप्ति की प्रतीति भी विशेषविषयक हो जायगी । एवञ्च कतिपय विशेषों का अनुप्रवेश हो तो अननुगम होगा और अशेष विशेषों का प्रवेश होने पर सर्वज्ञतापत्ति या अनुमानोच्छेद हो जायगा; क्योंकि व्याप्तिसिद्धि से ही सभी विशेष सिद्ध होंगे । यदि कहें कि विशेष के बिना सामान्यविषयक प्रतीति अनुपपन्न नहीं, किन्तु वह
परिच्छेद ] उपमान-लक्षण का खण्डन २८७ पक्षधर्मतया च यदि साध्यव्यक्तिभेदः सिद्धयेत्, तर्ह्यनुमाय तां प्रत्यक्षेण पुरुषद्वयदर्शने तद्विशेषासंशयो स्यात् । प्राग्विgrey/विशेषादर्शनात्तथा स्यादिति चेन्न । पश्चात्तत्र तद्दर्शित्वान्न संशयोतेति । उपमान-लक्षण-खण्डनम् उपमानमपि किमुच्यते ? सादृश्यज्ञानमुपमानमित्येके । तन्न ; स्मृतावपि प्रसङ्गात् । विशेष की आकाङ्क्षा करती है और यही अर्थावसान है, तो सामान्यविषयक प्रतीति ही अधिक की आकाङ्क्षा करती है अथवा अन्य किसी (पक्षधर्मता आदि) अधिक (विशेष) की आकाङ्क्षा करती है ? प्रथम पक्ष में सामान्यबुद्धि के दो व्यापार मानने पड़ेंगे। एक स्वजन्म और द्वितीय विशेष-विषयक आकाङ्क्षा। एवञ्च बुद्धि का बार-बार व्यापार न होने से वह अयुक्त है। द्वितीय पक्ष में व्याप्ति के बल पर सामान्यविषयक प्रतीति एक प्रमिति तथा पक्षधर्मता के बलपर विशेषविषयक अन्य प्रमिति, इस रीति से दो प्रमाण हो जायेंगे। यदि कहें कि सामान्य-विषयक प्रतीति अनुपपन्न नहीं है, किन्तु विशेष की प्रतीति ही पर्वतनिष्ठत्वादि अन्य विशेष के बिना अनुपपन्न है तो पर्वतनिष्ठत्व भी अन्य विशेष के बिना अनुपपन्न है एवं अन्य विशेष भी अन्य विशेष के बिना, इस तरह अनवस्थादोष हो जायगा । यदि पक्षधर्मता से साध्यव्यक्ति का भेद (विशेष) सिद्ध होता, तो अनुमान कर चक्षु से वह्नि के दर्शन-काल में तथा शब्दविशेष से पुरुष का अनुमान कर चक्षु से पुरुषद्वय के दर्शनकाल मे 'यही अनुमित वह्नि व्यक्ति है या अन्य' तथा 'यही अनुमित पुरुष है या अन्य' इत्याकारक सन्देह न होता। यदि कहें कि पूर्वकाल में विशेष का दर्शन (प्रत्यक्ष) नहीं है, अतः सन्देह होता है, तो पश्चात् (इदानीं सन्देहकाल में) विशेष का प्रत्यक्ष है, इसलिए सन्देह न होना चाहिए । सन्देह होता है, इसलिए जानते हैं कि अनुमिति सामान्यविषयक ही होती है; विशेषविषयक नहीं । उपमान-लक्षण का खंडन उपमान भी क्या है ? अर्थात् लक्षण न होने से वह भी अनिर्वचनीय ही है। निर्वचन—कुछ लोग कहते हैं कि 'सादृश्य का ज्ञान उपमान है' ऐसा लक्षण हो सकने से वह अनिर्वचनीय नहीं है। खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो सादृश्य की स्मृति भी उपमान हो जायगी । सादृश्य की स्मृति को उपमितिकरणरूपः उपमान
२८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अनुभव इत्यभिधाने च 'सदृशाविमौ' इतीन्द्रियजेऽपि प्रसङ्गात् । 'सोऽपि गवयो गवा सदृशो गवयत्वात्, गवयान्तरवदि'त्यनुमानस्यापि तत्त्वापत्तेः । एवमाप्तोक्तिजेऽपि । किञ्च—उपमितिलक्षणमिदमुपमितिकरणलक्षणं वा स्यात् ? नाद्यः; सादृश्य- स्योपमेयत्वापत्तेः । सदृशे चोपमेयव्यवहारोऽस्ति, 'चन्द्रोपमेयं मुखमि'त्यादि । सदृशमितिः सेति चेन्न । अक्षादिकरणासम्भवे तदुदाहरणासिद्धेः । नापि द्वितीयः ; सादृश्यज्ञानस्य सर्वस्यासम्भवत्प्रमाणान्तरव्यापारफल- जनकताया दर्शयितुमशक्यत्वात् । न च सादृश्यमेकमनुगतमस्ति । मुखसादृश्यस्य हस्तसादृश्यस्य च भेदेनैवो- पलम्भात् । नहीं मान सकते । कारण उसके अनन्तर अन्य अनुभव नहीं होता, जो फलरूप उपमिति कहलाये । साथ ही सादृश्य की स्मृति अप्रमा है और उपमिति प्रमा । इसलिए भी सादृश्य की स्मृति को उपमिति ( फलरूप उपमान ) नहीं मान सकते । समर्थन —सादृश्य का अनुभव उपमान है । खंडन—ऐसा करने पर 'सदृशौ इमौ' यह चक्षु आदि से जायमान ज्ञान भी उपमान हो जायगा । इसी तरह 'सोऽपि गवयो गवा सदृशः गवयत्वात्, गवयान्तरवत्' यह अनुमिति तथा 'गोसदृशो गवयः' इस शब्द से जात ज्ञान भी उपमान हो जायगा । किञ्च—'सादृश्य का अनुभव उपमान है' यह लक्षण उपमिति का है या उसके करण का ? प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण तब तो सादृश्य भी उपमेय हो जायगा । 'चन्द्रोपमेयं मुखम्' इस स्थल में सदृश में ही उपमेयव्यवहार होता है, सादृश्यमें नहीं । समर्थन—'सदृश का अनुभव उपमान है ।' खंडन—जहाँ चक्षुरादि, हेतु या शब्दरूप करण न हो, वहाँ सदृश का ज्ञान होता ही नहीं, जो उपमान कहलाये । जहां चक्षुरादि करण हैं, वहाँ सदृश-ज्ञान प्रत्यक्षादि ही है । 'सदृश का अनुभव उपमिति-करणरूप उपमान है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है । कारण जिसमें इन्द्रियादि अन्य प्रमाणों के व्यापार न हों, वैसा उपमितिरूप फल प्रसिद्ध ही नहीं है, जिसके करण को सदृशज्ञानरूप उपमान मानें । किञ्च—सदृशमात्र में अनुगत एक सादृश्य नहीं है; कारण मुख में चन्द्र का सादृश्य तथा हस्त में पल्लव का सादृश्य भिन्न भिन्न होता है, एक नहीं । अतः यदि मुखनिष्ठ सादृश्य के ज्ञान को उपमान कहें, तो हस्तनिष्ठ सादृश्य के ज्ञान में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।
परिच्छेद ] उपमान-लक्षण का खंडन २८६ : न च सादृश्यरूपत्वमनुगतं तेष्वपीत्यदोषः । तथापि सादृश्येन सह सादृश्ये अनेकस्थत्वादौ सादृश्यरूपत्वाश्रिते सादृश्यरूपत्वस्याऽऽश्रयणाभ्युपगमे परस्पराश्रय- भावः, अनभ्युपगमे वाऽननुगमः । तयोः सादृश्यानभ्युपगमे वाऽन्यत्रापि तथापत्तिः । किञ्च--वैधर्म्यप्रतीतेरपि प्रमाणान्तरत्वमेवं स्यात्, अविशेषात् । एवमेवाभ्यु- पगमे च परिगणितप्रमाणाधिक्यप्रसङ्गो वा सादृश्यबुद्धेरपि वा परिगणितेष्वेवान्त- र्भावः स्यादिति । अप्रतीयमानस्य प्रतीयमानेन सह सादृश्यप्रमितिरुपमानमित्यपि न ; आप्त- वाक्यादपि तथा प्रमितेः । समर्थन—सर्वसादृश्य में सादृश्यत्वरूप धर्म अनुगत है । अतः 'सादृश्यत्वविशिष्ट का अनुभव उपमान है' ऐसा लक्षण करने पर हस्तनिष्ठ सादृश्यज्ञान में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन— सादृश्य का अनेकस्थत्वरूप से सादृश्यत्व में जो सादृश्य है, उसमें यदि सादृश्यत्व मानें, तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि सादृश्यत्व न मानें, तो उस सादृश्य के ज्ञान का असंग्रह होने से उसमें उपमान के लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि कहें कि सादृश्य का सदृश्य सादृश्यत्व में हम मानते ही नहीं, तो फिर मुख में चन्द्र का सादृश्य भी न मानिये । कारण सादृश्य के न रहने पर भी यदि सादृश्य के सदृश्य की प्रतीति हो जाती है, तो मुख में भी चन्द्र-सादृश्य की प्रतीति हो ही सकती है । किञ्च—यदि सादृश्यज्ञान को प्रत्यक्षादि से भिन्न प्रमाण मानते हैं, तो 'गोविलक्षणोऽयं महिषः' यह वैलक्षण्य-प्रतीति होने से वैधर्म्यज्ञान भी एक अन्य ( पञ्चम ) प्रमाण हो जायगा । सादृश्य की प्रतीति से वैधर्म्य की इस प्रतीति में कोई विशेष नहीं है, जिससे सादृश्य की प्रतीति को प्रमाण मानें और वैधर्म्य की प्रतीति को प्रमाण न माना जाय । यदि वैधर्म्य की प्रतीति को भी प्रमाण मान लें, तो परिगणित प्रमाण का आधिक्य हो जायगा, अथवा वैधर्म्य की प्रतीति तुल्य सादृश्य की प्रतीति का भी किसी प्रमाण में अन्तर्भाव हो जायगा । समर्थन— मीमांसक कहते हैं कि 'प्रतीयमान ( गवय ) के अप्रतीयमान ( गौ ) में सादृश्य की प्रमिति उपमिति है और उसका करण उपमान है ।' खण्डन— तब तो 'त्वदीया गौः अनेन गवयेन सदृशी' इस आप्तवाक्य से उत्पन्न सादृश्य की प्रमिति भी उपमिति कही जाने लगेगी । ३७
२६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यत्र तद्व्यापारो नास्तीति चेन्न । 'स चायञ्च अभिन्नौ' इतिवत् 'स चायञ्च सदृशावि'ति पूर्वप्रतीतस्य प्रतीयमानेन सहैव ऐन्द्रियकसादृश्यप्रतीतावपि प्रसंगात् । इन्द्रियासम्पृक्तस्येति चेन्न । प्रत्यक्षतो गोगवयसादृश्यं प्रतीत्य 'साऽपि च गौर्गवयेन सदृशी, गोत्वादियमिति'त्यनुमितावपि प्रसंगात् । अलिङ्गजापीति चेन्न । नन्वेवं प्रत्यक्षानुमानशब्दानुत्थत्वे सतीत्युक्तं स्यात् । तथा च विशेषणमेव समर्थमित्यप्रतीयमानस्येत्यादि व्यर्थम् । नोपादेयमेव पदान्तरमिति चेन्न । अर्थापत्तेरवश्यं सम्भवात्, तेन सार्धमेत- त्साहश्यस्याननेन सार्धं तत्सादृश्यव्यतिरेकेणानुपपद्यमानत्वात् । अन्यथा प्रत्ययो- त्पत्तिविषयं प्रमाणान्तरमापद्येत । तस्मात् 'अयं ह्रस्वः' इति प्रतीतेः 'अस्मात् स समर्थन — 'जहाँ शब्द का व्यापार न हो, ऐसी उक्त प्रमिति उपमिति और उसका करण उपमान है' ऐसा कहेंगे । खंडन — 'स च अयञ्च अभिन्नौ' इस प्रत्यभिज्ञा की तरह 'स च अयञ्च सदृशौ' यह चाक्षुष प्रत्यभिज्ञा भी होती है । किन्तु अब वह उपमान हो जायगी । समर्थन — 'जहाँ इन्द्रिय का सन्निकर्ष भी न हो, ऐसी उक्त प्रमिति उपमान है ।' खण्डन — जहाँ प्रत्यक्ष से गो तथा गवय के सादृश्य की प्रतीति के अनन्तर 'साऽपि गौः गवयेन सदृशी, गोत्वात्, इयमिव' ऐसी अनुमिति होती है, उसमें उपमानत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । समर्थन — 'लिङ्ग से भी अजन्य उक्त प्रमिति उपमान है' ऐसा कहेंगे । खण्डन — तब तो 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द से जो अजन्य हो — यह अर्थ हुआ । एवञ्च 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द से अजन्य ज्ञान उपमान है' इतना ही लक्षण युक्त है, 'अप्रतीयमानस्य प्रतीयमानेन' इत्यादि विशेष्यदल व्यर्थ हो जायगा । यदि कहें कि 'अप्रतीयमानस्य' आदि विशेष्यांश नहीं ही देना चाहिए, तो भी युक्त नहीं । कारण उपमान का फल अर्थापत्ति से ही सिद्ध है । देखिये — उसके साथ इसका सादृश, इसके साथ उसके सादृश्य के बिना अनुपपन्न है, अतः उसके साथ इसके सादृश्य से इसके साथ तत्सादृश्य का आक्षेपरूप ज्ञान हो जायगा । अन्यथा यदि प्रतीयमान के साथ अप्रतीयमान के सादृश्य की प्रतीति को अर्थापत्ति न मानें (प्रमाणान्तर मानें), तो प्रतीयमान महिष के साथ अप्रतीयमान गौ के वैधर्म्य की प्रतीति भी प्रमाणान्तर कही जायगी । इसी तरह 'उससे यह ह्रस्व है' इस प्रतीति से उत्पन्न 'इससे
परिच्छेद ] उपमान लक्षण का खण्डन २६१ दीर्घः' इति चान्यथा कतमा प्रमा स्यात् । अर्थापत्तिं प्रमाणान्तरमनिच्छताऽपि इयमर्थापत्तिरनुमाने वाऽन्तर्भाव्या पृथक् प्रमाणीकर्त्तव्या वा । एतेन—अप्रतीतगवय-गवान्तरसामान्यस्य अदृष्टान्तानुमानासम्भवात् 'गवये- नानेन सदृशी सा गौरि'ति मितिरुपमितिरित्यपि व्युदस्तम् । तयैतत्सादृश्यस्य एतेन तत्सादृश्यं विनाऽनुपपत्त्यैव सिद्धेरिति । अनवगतसङ्गति-संज्ञासमभिव्याहृतवाक्यार्थस्य संज्ञिन्यनुसन्धानमुपमानमित्यपि न ; प्रस्मृतसङ्गेतेरेवम्भूतोपमित्यव्यापनात् । अस्मृतसंगतीत्यभिधेयमिति चेन्न । अनुभूत-स्मृत-कालान्तरप्रस्मृतसङ्गते- रव्यापनात् । वह दीर्घ है' यह प्रतीति कौन-सी प्रमा होगी ? जो पण्डित अर्थापत्ति को प्रमाणान्तर नहीं मानते, अनुमान में अन्तर्भूत ही मानते हैं, उन्हें 'इससे वह दीर्घ है' इस अर्थापत्ति को अनुमान के अन्तर्गत या पृथक् प्रमाण मानना ही होगा । 'जिस पुरुष को पूर्वकाल में गो-गवय के सादृश्य की प्रतीति नहीं है, उसे दृष्टान्त के न होने से अनुमिति तो होगी नहीं । अतः उस पुरुष की 'इस गवय के सदृश मेरी गौ है' यह प्रतीति उपमान है'—यह कथन भी खण्डित जानना चाहिए । कारण उसे उसके साथ एतत्सादृश्य की [ इसके साथ तत्सादृश्य के बिना ] अनुपपत्ति से ही 'इस गवय के सदृश मेरी गौ है' यह प्रतीति हो सकती है । निर्वचन—नैयायिक कहते हैं कि 'जिस शब्द का संकेत अज्ञात हो, उस शब्द से युक्त वाक्य के अर्थ का शब्द में अनुसंधान उपमान है।' खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण जिस शब्द का संकेत प्रथम तो अवगत हो और पश्चात् विस्मृत हो गया हो, उस शब्द से समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में उपसंहार भी सिद्धान्ततः उपमान है । किन्तु वहाँ सङ्केतज्ञान पहले हो जाने के कारण उक्त लक्षण न जाने से अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस शब्द का संकेत अस्मृत हो, उससे समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में अनुसंधान उपमान है।' प्रकृत में यद्यपि संकेत अवगत है, तथापि स्मृत तो नहीं है, अतः अव्याप्ति नहीं है । खंडन—जहाँ प्रथम तो संकेत अनुभूत हुआ, पश्चात् स्मृत होकर पुनः कालवश विस्मृत हुआ हो, वहाँ भी शब्द में उक्त वाक्यार्थ का अनुसंधान उपमान ही है। किन्तु संकेत में स्मृतिविषयत्व ही है, उसका अभाव नहीं है । अतः वहाँ उक्त लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।
२६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्मर्यमाणेति चेन्न। कदाचित् स्मर्यमाणतायारतत्रापि सम्भवात् । सर्वदा अस्मर्यमाणतायाः क्वचिदप्यसम्भवात् । उपमितिप्राक्काल इति चेत् , स्यादेवैतत् यद्युपमितिर्लक्षिता स्यात् । तदर्थमेव तु क्रन्दनमिदं भवतः । किञ्च—सर्वैरनवगतसङ्गतिकत्वस्य प्रकृतेऽप्यसिद्धेः। केनाप्यनवगतसङ्गतित्वस्य वाक्यजेऽपि सम्भवात् । उपमात्रेति च पूर्ववत् निरस्तम् । यस्या प्रमितेर्येन प्रमात्रेति चाभिधाने अनुगतरूपाभावात् व्यक्तौ ऽतनेन लक्षणाननुगत्यापत्तेः । समर्थन—'अस्मर्यमाण ( वर्तमान स्मरण का अविषय ) है संकेत जिस शब्द का, उससे समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में अनुसन्धान उपमान है।' उक्त स्थल में वर्तमान स्मरण नहीं, अतः अव्याप्ति नहीं । खंडन—यदि कदाचित् वर्तमान स्मरण का विषयत्व उक्त स्थल में भी है, अतः वह अव्याप्ति तदवस्थ ही है । सर्वदा वर्तमान स्मरण- विषयत्व का अभाव कहीं भी नहीं है, कारण स्मृति क्षणिक होने से सर्वदा वह वर्तमान नहीं रहती । अतः अलीकप्रतियोगिक होने से उक्त अभाव प्रसिद्ध न हो सकने के कारण असम्भव हो जायगा । समर्थन—'उपमिति से प्राक्-काल में वर्तमान स्मरण का अविषय जो संकेत' आदि कहें, तो कुछ दोष नहीं होगा । खंडन—ऐसा कह सकते, यदि उपमिति की निरुक्ति हो चुकी होती । उपमिति के लक्षण के लिए ही तो आपका यह क्रन्दन है । फिर इस काल में ऐसा परिष्कार कैसे हो सकता है ? किञ्च—सब मनुष्यों से अनवगत संकेत उपमितिस्यल में भी नहीं है और एक-दो- व्यक्तियों से अनवगत संकेत वाक्य से जायमान बोधमात्र में है। अतः सब मनुष्यों से अनवगतत्व की विवक्षा करें, तो असम्भव और एक-दो व्यक्तियों से अनवगतत्व की करें, तो अव्याप्ति हो जायगी । 'उपमितिकर्ता से अनवगत संकेत' आदि तो उपमिति-निरुक्ति से पूर्व कह ही नहीं सकते । यदि कहें कि 'जिस प्रमाता से जिस संज्ञा का संकेत अनवगत है, उससे समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में अनुसन्धान उस प्रमाता के लिए उस शब्द के विषय में उपमान है', तो यत्-तत् शब्द के व्यक्तिपरक होने से जिस व्यक्ति का यत्-शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी ।
'संज्ञेत्यप्याकुलम् ; 'गोसदृशो गवयः प्रायः कानने महति दृश्यते' इति श्रुत- वाक्यस्य काननपदाविदितसङ्गतर्गवयपदविदितसङ्गतेश्च असंज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रति- पत्तिफलायामीदृशप्रतिपत्तौ गतत्वेनातिव्यापकत्वात् । विनाऽपि वा प्रायः शब्दमभिहितस्य तस्यानुसन्धाने प्रसङ्गः । तत्र काननसंज्ञासंज्ञिसम्बन्धावधारणेऽपि अन्यत्रैव पदान्तरसमभिव्याहारोत्थाया अन्यथानुपपत्तेः प्रमाणत्वात् , न तु उपमानस्य । उपमेयसंज्ञासमभिव्याहृतेति विशेषणे च पूर्वोक्त एव निरासः । वाक्यार्थे-यपि तादृगेव; प्रतिपत्तिकालस्मृतातिदेशवाक्यावगत-काननादिपदा- र्थ-य तथाविधप्रत्ययाव्यापनात् । वाक्यैकदेशस्यापि वाक्यत्वेन विवक्षितत्वे 'सदृशो गवयः' इत्यादिस्मारिणोऽपि प्रत्यये प्रसङ्गात् । किञ्च—लक्षण में शब्दपद का निवेश भी सदोष ही है। देखिये—जिस पुरुष ने 'गोसदृशो गवयः प्रायो महति कानने दृश्यते' इस वाक्य का श्रवण तो किया, पर कानन पद का संकेत नहीं जाना और गवय पद का संकेत जानता है, उस पुरुष के अनुमानरूप [ यही कानन है, गवयाधार होने से' इत्याकारक ] अनुसन्धान में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसके भी कानन पद का फल संकेतज्ञान ही है। जहाँ 'प्रायः' पद नहीं है, ऐसे उक्त वाक्य के अनुसन्धान में भी अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण यहाँ भी कानन पद के संज्ञा-संज्ञिसम्बन्ध के अवधारण में 'इह हि प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबति' इस वाक्यगत मधुकर पद के समान पदान्तरसमभिव्याहार से उत्थित अन्यथानुपपत्ति ही प्रमाण है, उपमान प्रमाण नहीं । अर्थात् 'यदि यह कानन पद का अर्थ न हो, तो कानन पद में गवय पद का सन्निधान अनुपपन्न हो जायगा' इत्याकारक अनुपपत्ति से ही कानन पद का संकेत ग्रह होगा । 'अनवगतसङ्गति-उपमेयसंज्ञा से समभिव्याहृत' आदि निवेश करें, तो उसका भी पूर्वोक्त निरास है, अर्थात् उपमिति की निरुक्ति से पूर्व वह नहीं हो सकता । किञ्च—लक्षण में वाक्यार्थ का निवेश भी सदोष ही है। सुनिये—जहाँ पहले 'गोसदृशो गवयः प्रायो महति कानने दृश्यते' वह वाक्य तो श्रुत हो, किन्तु अदृष्टवश वाक्यघटित कानन पद का अर्थ स्मृत न हुआ हो, उस स्थल में वाक्यार्थ का अनुसन्धान नहीं है। किन्तु वाक्य के एकदेशार्थ का अनुसन्धान है, अतः अव्याप्ति हो जायगी । यदि वाक्य के एकदेश को भी वाक्य मान लें, तो 'सदृशो गवयः' एतावन्मात्र के अर्थ का अनुसन्धान भी उपमान हो जायगा ।
२६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रतीत्युत्पत्तिं प्रति प्रयोजकीभूतं यावत् , तावद्वाक्यं विवक्षितमिति चेन्न । अन्तर्भावितवनाधिकरणतादृशप्रतिपत्तिं प्रति तस्यापि प्रयोजकत्वात् । उपमिति प्रतीति तु पूर्ववन्निरस्तमिति । यावत् संज्ञासंज्ञिबुद्ध्यौपयिकं तावद्विवक्षितमिति चेन्न । लक्षणसहचरितसंज्ञो- पदेशार्थानुसन्धानेऽपि प्रसङ्गात् । किञ्च—यदा तर्कानुसन्धानविरहिणः सत्यप्येवंविधानुसन्धाने सादृश्यमेव गवयपदप्रवृत्तिनिमित्तमिति मितिः फलमुत्पद्यते, तदा तस्याप्रमाकरणस्यापि उपमानत्वमापद्यते । प्रमाफलकमिति विशेषणप्रक्षेपपक्षे चानुसंहितरूपव्यवहार्यता- नुमित्युत्पादेनापि एतादृशानुसन्धानमुपमानं स्यात् । समर्थन—'प्रतीति की उत्पत्ति का प्रयोजक जितना वाक्य हो, तदर्थ का अनुसन्धान उपमान है।' 'सदृशो गवयः' यह वाक्य प्रतीति में प्रयोजक नहीं है, अतः उसमें अति- व्याप्ति नहीं है । खंडन— वन भी जिसका विषय है, ऐसी प्रतीति का प्रयोजक 'गोसदृशो गवयः प्रायो महति कानने दृश्यते' यह वाक्य भी है। किन्तु दैववश जहाँ उक्त वाक्यगत कानन पदार्थ का स्मरण नहीं हुआ, उस स्थल में वाक्यार्थ का अनुसन्धान न होने से 'उपमिति का प्रयोजक जितना अंश हो, उतना ही उक्त लक्षण में वाक्य है'—यह नहीं कह सकते । 'उपमितिरूप प्रतिपत्ति के प्रति प्रयोजक' इत्यादि तो कह नहीं सकते; क्योंकि वह तो पूर्ववत् निरस्त हो जायगा । अर्थात् उपमिति की निरुक्ति के पूर्व ऐसा कह ही नहीं सकते । समर्थन—संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध की बुद्धि का प्रयोजक यावत् अंश हो, उक्त लक्षण में वाक्यशब्द से तावन्मात्र की विवक्षा मानेंगे, तो कोई दोष नहीं होगा । खण्डन— 'गन्धवती पृथिवी' इस लक्षणवाक्य के श्रवण के बाद गन्धयुक्त व्यक्ति का प्रत्यक्ष होने पर जो 'सेयं गन्धवती पृथिवी' यह अनुसन्धान होता है, उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। कारण यहाँ भी अज्ञात-संकेत-समभिव्याहृत वाक्यार्थ का संज्ञी में अनुसन्धान है ही । किन्तु यह व्यतिरेकी अनुमान है, उपमान नहीं । किञ्च—लाघवरूप तर्क का अनुसन्धान न होने पर 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य के श्रवण के बाद गोसदृश व्यक्ति का प्रत्यक्ष होने पर जहाँ 'स एवायं गोसदृशो गवयः' यह अनुसन्धान होता है, उस स्थल में 'गोसादृश्य ही गवय पद का प्रवृत्तिनिमित्त है' ऐसा ज्ञान होता है । उस अप्रमा का करण भी उपमान हो जायगा । यदि कहें कि 'प्रमिति के जनक उक्त वाक्य के अर्थ का अनुसन्धान उपमान है', तो अनुसंहित जो पृथिवीत्व-
परिच्छेद ] उपमान लक्षण का खण्डन २६५ अव्याप्तविषयप्रमाफलकमिति विशेषणीयमिति चेन्न । वस्तुगत्याऽव्याप्तत्व- स्योपमेयेऽप्यभावात् । व्याप्ततयाऽनवगम्यमानस्येति च कृते यत्प्रति तल्लिङ्गं तेन सह व्याप्तत्वावगतमुपमितिकरणमपि न व्याप्नुयात् । उपमेयेन सह व्याप्तत्वानवगतत्वोक्तावप्यनुमाने प्रसङ्गस्तदवस्थः । अनुमे- येन सहेति कृते च तदनपायाद्व्याप्तिस्तदवस्थैव । संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रमितिकरणमिति चेन्न । तथात्वासिद्धेः, अर्थापत्त्यादित- स्तत्सिद्धेर्वक्ष्यमाणत्वात् । रूप धर्म तद्व्यवहार्यत्वानुमिति के उत्पादक लक्षणवाक्य के अर्थ के अनुसन्धान में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्त (लिङ्ग) जिसका विषय न हो, ऐसा जो [प्रमाफलक उक्त वाक्यार्थ के संज्ञी में ] अनुसन्धान है, वह उपमान है।' अतः लक्षण-वाक्यार्थ के अनुसन्धान में अतिव्याप्ति नहीं, कारण पृथिवीत्व से व्यवहार्यत्व का व्याप्त गन्धवत्त्व आदि लिङ्ग उक्त अनुसन्धान के विषय हैं। खण्डन—ऐसा मानने पर 'स एवायं गोसदृशो गवयः' इत्याका- रक अनुसन्धान भी उपमान न कहलायेगा, कारण पदार्थत्व आदि से व्याप्त ही गोसादृश्य उक्त अनुसन्धान का विषय होता है। यदि कहें कि 'व्याप्तत्वरूप से ज्ञात है विषय जिसका, ऐसा [प्रमाफलक उक्त वाक्यार्थ का] अनुसन्धान उपमान है । गोसादृश्य व्याप्त होने पर भी व्याप्तत्वरूप से ज्ञात नहीं है; अतः अव्याप्ति नहीं', तो जिस काल में पदार्थत्व के व्याप्तत्वरूप से गोसादृश्य अवगत होता है, उस काल में उसका अनुसन्धान उपमान न कहा जायगा। समर्थन—उपमेय के साथ व्याप्तत्वरूप से अनवगम्यमानविषयक उक्त अनुसन्धान उपमान है। गोसादृश्य, उपमेय गवय से व्याप्तत्वरूप से अवगत नहीं है, अतः अव्याप्ति नहीं । खंडन—गन्धवत्त्व भी उपमेय के साथ व्याप्तत्वरूप से अनवगम्यमान नहीं है, अतः लक्षणवाक्यार्थ का अनुसन्धान भी उपमान हो जायगा । यदि अनुमेय के साथ व्याप्तत्वरूप से अनवगम्यमान कहें, तो जिस काल में गोसादृश्य पदार्थत्व के साथ व्याप्तत्वरूप से अवगत है, उस काल में 'स एवायं गोसदृशो गवयः' यह अनुसन्धान उपमान नहीं कहलायेगा । समर्थन—'संज्ञा और संज्ञी के सम्बन्ध की प्रमिति का कारण जो उक्त अनुसं- धान है, वह उपमिति है।' खंडन—तब तो लक्षणवाक्यार्थ का अनुसन्धान भी उपमान हो जायगा । किञ्च—संज्ञा-संज्ञिभाव की प्रमिति, अर्थापत्ति या अनुमान से ही सिद्ध है। अतः उक्त अनुसन्धान उसका कारण नहीं । .
२६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अननुमितिजनकं तादृक् प्रतिसन्धानमुपमानमिति चेन्न। तज्जातीयस्यानु- मितिजनकत्वात्। व्यक्त्यपेक्षायाञ्च जनकत्वस्य सामान्याकारपर्यवसायिनो नित्यं व्यक्तावसम्भाविततया अननुगमेन चायुक्तत्वादिति। किञ्च—गोसादृश्यं विहाय गवयत्वजातौ गवयशब्दार्थताप्रतीतिः कल्पना- लाघवाख्यं तर्कमपास्य न स्यादिति तदुपन्यासस्थितौ किमानुमानिक्येव तत्र गवय- त्वस्य गवयपदवाच्यताप्रमितिरियं नेष्यते। सम्भवति हि प्रयोगः—विमतिपदं गवयशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं तथात्वे तर्केणविषयीक्रियमाणविपर्ययकत्वात्, न यदेवं न तदेवं यथा गोत्वम्, तथा चेदम्, ततस्तथे'ति। न ह्यस्ति सम्भवो मूलशैथिल्यादि- दोषविरहिततर्कनिवेदितविपर्ययश्चार्थो न च तथेति। समर्थन—'अनुमिति का अजनक उक्त अनुसन्धान उपमान है।' खण्डन—इसका क्या अर्थ है, क्या जिस अनुसन्धान का सजातीय अनुमिति का अजनक हो, यह अर्थ है या जो अनुसन्धान व्यक्ति अनुमिति का अजनक हो, यह अर्थ है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण 'स एवायं गोसदृशो गवयः' इस अनुसन्धान का सजातीय अन्य अनुसन्धान भी कदाचित् अनुमिति का जनक हो सकता है। द्वितीय कल्प भी अयुक्त है; कारण सामान्यरूप से गृहीत जनकत्व [ फलोपधायकत्व न हो, किन्तु स्वरूपयोग्यत्व ] सभी व्यक्तियों में अवश्य रहता है। अतः कोई भी व्यक्ति अनुमिति का अजनक न होने से असम्भव हो जायगा । साथ ही लक्षण में व्यक्ति का प्रवेश होने से व्यक्ति- भेद से लक्षण के भेद होने के कारण अननुगम हो जायगा । किञ्च—गोसादृश्य को छोड़कर गवयत्व-जाति में गवयशब्दार्थत्व की कल्पना लाघवरूप तर्क के बिना हो नहीं सकती । जब उपमान में भी लाघवरूप तर्क की अपेक्षा ही है, तो जिस अनुमान को सभी मानते हैं, उसीमें लाघवरूप तर्क को सहकारी क्यों न माना जाय ? पञ्चावयव के प्रयोग का भी सम्भव है। देखिये—'विप्रतिपत्ति (सन्देह) का विषय गवयत्व गवयशब्द की प्रवृत्ति का निमित्त है, गवयत्व के प्रवृत्तिनिमित्तत्व में तर्क से अविषयीकृत विपर्यय होने से, जो गवयशब्द का प्रवृत्तिनिमित्त नहीं है, वह तर्क से अविषयीक्रियमाण विपर्ययक नहीं है, जैसे गोत्व अथवा गोसादृश्य, यह गवय तर्क से अविषयीक्रियमाण विपर्ययक है, अतः गवयशब्द का प्रवृत्तिनिमित्त है।' यह सम्भव नहीं कि कोई अर्थमूलशैथिल्य आदि दोषों से रहित तर्क से निवेदित विपर्ययक हो और प्रवृत्ति में निमित्त न हो।
: परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन २६७ अथवा गवयपदमसम्भवत्प्रवृत्तिनिमित्तान्तरमनुपपद्यमानाप्तोक्तगोसादृश्य- सामानाधिकरण्यमर्थाद् गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकतामाक्षिपेदित्यर्थापत्तिरेवात्र प्रमाण- मस्तु । सा च त्वया व्यतिरेकीकृत्य परेण पृथगेवावश्यं प्रमाणीयेति । शब्द-लक्षण-खण्डनम् शब्दोऽपि क उच्य ? आप्तवाक्यं हि शब्दः प्रमाणमिति न युक्तम् ; विकल्यानुपपत्तेः । तथा हि— कोऽयमाप्तो नाम ? यथादृष्टवादीति चेन्न । भ्रान्तिप्रतिपन्नवादिवाक्येऽपि प्रसङ्गात् । प्रमाण- दृष्टेति विशेषणे च तथाभूतस्यान्यथावाद्यव्यापनात् । अथवा 'गवय' शब्द के 'गवयत्व' रूप प्रवृत्तिनिमित्तकत्व के बिना उसमें आप्तपुरुषों से उक्त 'गोसदृश' शब्द का सामानाधिकरण्य अनुपपद्यमान है। अतः वह अपने गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकत्व का आक्षेप करेगा। इस तरह अर्थापत्ति ही प्रमाण रहे । उसे आप नैयायिक व्यतिरेकी अनुमानरूप और अन्य मीमांसकादि पृथक् प्रमाणरूप मानते ही हैं। गोत्व कथंचित् कालिकादि सम्बन्ध से गवय में रहता है, अतः उसको प्रवृत्तिनिमित्त मानने में गौरव है । एवञ्च प्रसिद्धपद के समभिव्याहार से जनित अन्यथा- नुपपत्ति ही सम्बन्ध-प्रमिति का मूल होने से उपमान नामक कोई प्रमाणान्तर ही नहीं है। शब्द-लक्षण का खण्डन प्रमाणभूत शब्द भी क्या वस्तु है ? अर्थात् शब्द-प्रमाण का लक्षण न हो सकने से वह भी अनिर्वचनीय ही है। निर्वचन —'आप्त का वाक्य ही प्रमाण-शब्द है' ऐसा लक्षण हो सकने से वह अनिर्वचनीय नहीं है। खंडन—यह लक्षण युक्त नहीं, कारण आप्तत्व की निरुक्ति ही नहीं हो सकती। कहिये, आप्त कौन है ? निर्वचन—'जैसा देखा हो, वैसा ही कहनेवाला आप्त है।' खंडन—तब तो भ्रम से शुक्ति को रजतत्वरूप से देखकर जो शुक्ति को रजत कहता है, वह भी आप्त हो जायगा। कारण उसने जैसा देखा है, वैसा ही कहा है। ३८
२६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यथाप्रमाणेति करणे चांशे तथाभूतवादिवाक्यस्यायथार्थस्यापि व्यापनात् । यावद्यथाप्रमाणदृष्टनिरुक्तौ च प्रायेणातथाभूतत्वादेव लक्ष्याणां तदव्याप्तेः। नहि यावत्प्रमितं तावदभिधीयते । यथाप्रमितस्यैव च वक्तुर्वाक्यमिति व्याकारे च युधिष्ठिरवाक्यस्यापि अनेवम्भूतत्वेनाव्याप्त्यापत्तेः । तत्र विषय इति विशेषणे च विशेषरूपस्य विषयस्यासाधारयेन अव्यापकत्वापातात् । अथ निर्दोषस्य वाक्यं तथेति चेन्न । सदोषस्य ‘नास्ति घटः' इत्यभिधित्सतः 'अस्ति घटः' इति दैवान्निर्गतयथार्थवाक्याव्याप्तेः । तत्प्रमाणं न भवत्येवेति चेन्न। समर्थन—'प्रमाण से जो दृष्ट हो, उसे कहनेवाला आप्त है।' खण्डन—'प्रमाण से दृष्ट शुक्ति को इदानीं रजत कहनेवाला भी आप्त हो जायगा। समर्थन— 'प्रमाण से जैसा देखा हो, वैसा ही कहनेवाला आप्त है।' खण्डन— रङ्ग (राँगे) में 'इमे रङ्ग-रजते' इस भ्रमस्थल में उक्त वाक्य का वक्ता भी आप्त हो जायगा, कारण रङ्गत्वरूप से प्रमाणदृष्ट को रङ्गत्वरूप से भी वह कहता ही है। समर्थन—'जितनी वस्तुएँ जिन रूपों से प्रमाण द्वारा दृष्ट हों, उतनी ही वस्तुओं को उन्हीं रूपों से कहनेवाला आप्त है।' खण्डन—प्रायः ऐसे उदाहरण नहीं मिलते, अतः असम्भव हो जायगा । जिस-जिस रूप से वस्तु प्रमित होती है, उन सभी रूपों से वस्तु का एक साथ कथन हो नहीं सकता । समर्थन—'जैसा जो प्रमित हो, वैसे ही उसीको जो कहे, अप्रमित को कदापि न कहे, ऐसे वक्ता का वाक्य प्रमाण है।' खंडन—युधिष्ठिर जो आप्तस्वरूप से प्रसिद्ध हैं, उनके वाक्य में भी अव्याप्ति हो जायगी । कारण उन्होंने भी कभी अप्रमित 'अश्व- त्थामा हतो नरो वा हस्ती वा' यह वाक्य कहा था । समर्थन—'जैसा जो प्रमित हो, उसे वैसा ही कहनेवाला उस विषय में आप्त है और उसी विषय में उसका 'वाक्य प्रमाण है।' खंडन—लक्षण में यत्शब्द को 'तद्व्यक्तिपरक ही मानेंगे, अतः जिस व्यक्ति का ग्रहण करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'निर्दोष पुरुष का वाक्य प्रमाण-शब्द है।' खण्डन—घटवत् भूतल में आशय-दोष से 'नास्ति घटः' यह कहना चाहनेवाले भी सदोष पुरुष के मुँह से दैववश निकला हुआ 'अस्ति घटः' यह वाक्य भी प्रमाण न कहलायेगा, कारण उसका
परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन २६६ पूर्वमुक्तोत्तरत्वात् । प्रवृत्तिसामर्थ्येन प्रामाण्यावधारणसम्भवादापातः सन्देहेऽप्य- दोषात् । सामान्यतो निर्दोषत्वस्य भोमाग्रजेऽप्यभावात्, विशेषतस्तथात्वस्य असाधारण्यपर्यवसायित्वात् । यथार्थवाक्यं शब्दः प्रमाणमित्यत्र को दोष इति चेन्न । पूर्वोक्तयाथार्थ्यदूष- णानि तावत्प्रथमः । यथार्थमिति विशेषणस्य व्यवच्छेदकत्वाऽव्यवच्छेदकत्वयोः पूर्ववद्दोषश्च द्वितीयः । वाक्यत्वानिरुक्तिश्च तृतीयः । तथाहि—किमिदं वाक्यं नाम ? प्रयोक्ता सदोष ही है। 'वह वाक्य अप्रमाण है' यह नहीं कह सकते; कारण उसका विषय अबाधित है और संवादी प्रवृत्ति होने से उसमें प्रामाण्य ही सम्भव है। सदोष पुरुष का वचन होने से उसमें आपाततः सन्देह हो, तो भी कुछ हानि नहीं। किञ्च—यदि निर्दोष शब्द का अर्थ सब दोषों से रहित मानें, तो युधिष्ठिर भी ऐसे नहीं हैं। यदि यत्किञ्चित् दोष के अभाव से विशिष्ट को निर्दोष शब्दार्थ मानें, तो लक्षण सर्वलक्ष्यसाधारण न होने से अननुगम हो जायगा । अर्थात् यदि वञ्चनारूप दोष के अभाव का लक्षण में निवेश करें, तो तदभावविशिष्ट वक्ता के वाक्यमात्र में समन्वय हो जायगा, पर लोभरूप दोषा- भावविशिष्ट वक्ता के वाक्य में समन्वय नहीं होगा । समर्थन—'यथार्थवाक्य शब्द-प्रमाण है' इस लक्षण में क्या दोष है ? खंडन— प्रथम तो 'यथार्थानुभवः प्रमा' इस लक्षण के खण्डन में उक्त दोष होंगे । अर्थात् यदि वाक्य में अर्थसादृश्य प्रमेयत्वरूप से ग्रहण करें तो आभासवाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः 'यथार्थज्ञानजनक वाक्य प्रमाण है' ऐसा लक्षण करना होगा । इस लक्षण में भी यदि यत्किञ्चित् रूप से सादृश्य का ग्रहण करें, तो भ्रान्तिज्ञान प्रमेयत्वरूप से अर्थसदृश होने से तज्जनक वाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि भासमान आकार से सादृश्य का ग्रहण करें, तो 'रूपी घटः' इस वाक्य में अव्याप्ति हो जायगी; कारण रूपकत्त्व से ज्ञान में अर्थसादृश्य नहीं है, आदि दोष होंगे । इसी तरह यदि अयथार्थ वाक्य को 'यथार्थ' इस विशेषण का व्यवच्छेद्य मानें, तो जो अंशतः यथार्थ और अंशतः अयथार्थ वाक्य है, वह यथार्थ अंश में भी प्रमाण न होगा । यदि व्यवच्छेद्य न मानें, तो यथार्थविशेषण व्यर्थ हो जायगा—यह द्वितीय दोष है । वाक्यत्व की अनिरुक्ति तृतीय दोष है। देखिये—वाक्य क्या वस्तु है ? अर्थात् उसका निर्वचन नहीं हो सकता ।
एकार्थावच्छिन्नपदसमुदायो वाक्यमिति चेन्न । एकत्वविषयत्वावच्छिन्न- त्वानां वाच्यानि दूषणानि तावत्सन्तु, पदपदार्थं तु चिन्तयामः । सुप्तिङन्तं पदमिति केचित् । वर्णा विभक्त्यन्ताः पदमित्यन्ये । तत्र नाद्यः ; प्रत्येकं मिलितस्य चाव्यापकत्वात् । पृथक्प्रवृत्तिनिमित्ततायाश्च वाक्यलक्षणाव्यापकत्वापातात् । नापि द्वितीयः ; विभक्त्यर्थस्यानुगतस्यासम्भवात् 'विभक्तिरि'त्यनेन सुप्तिङोः , 'प्राग्दिशोऽविभक्ति'रित्यनेन च तसिलादेः पृथक् पृथगेव विभक्तिसंज्ञाविधानात् शब्दसाम्येन च लक्षणाऽयोगात् । निर्वचन—'एक अर्थ से अवच्छिन्न अर्थात् एक अर्थ का वाचक पदसमुदाय वाक्य है ।' खंडन—एकत्व, अर्थत्व और अवच्छिन्नत्व में वक्तव्य दोष संप्रति रहने दें । अर्थात् सम्प्रति क्या एकत्व संख्यारूप है या द्वित्वादिविरहरूप ? इसी तरह अवच्छि- न्नत्व भी विशेषण-विशेष्यसम्बन्धत्व-से अतिरिक्त है या अनतिरिक्त ? दोनों ही विकल्प नहीं बन सकते, यह सब चतुर्थ परिच्छेद में विचारा जायगा । यहाँ केवल पद शब्द के अर्थ का विचार करते हैं कि पदशब्द का अर्थ क्या है ? निर्वचन—कोई आचार्य 'सुप्तिङन्तं पदम्' यह पद का लक्षण करते हैं । अन्य आचार्य 'विभक्त्यन्त वर्ण' को पद कहते हैं । खण्डन—इनमें प्रथम लक्षण युक्त नहीं है, कारण यदि सुबन्त को पद कहें, तो तिङन्त में और यदि तिङन्त को पद कहें, तो सुबन्त में अव्याप्ति हो जायगी । यदि सुप्तिङन्त को पद कहें, तो सुप्तिङ दोनों किसीके अन्त में नहीं हैं, अतः असम्भव हो जायगा । यदि 'सुबन्तं पदम्, तिङन्तं पदम्' इस रीति से दो लक्षण करें, तो सुबन्त 'पद है इस लक्षण की तिङन्त में और तिङन्त पद है, इस लक्षण की सुबन्त में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण 'विभक्तिश्च' इससे सुप्-तिङ् की और 'प्राग्- दिशोऽविभक्तिः इससे तसिलादि की पृथक्-पृथक् विभक्ति-संज्ञा होने से विभक्तिशब्द का अनुगत अर्थ नहीं है। अतः शब्दसम होने से केवल सुबन्त-तिङन्त में समन्वित विभक्त्यन्त वर्ण पद है, यह लक्षण हो नहीं सकता । अन्यथा यदि यह लक्षण मानें, तो सुपरहित केवल तसिलन्त भी पद हो जायगा ।
परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन ३०१ किञ्च—वर्णा इति बहुत्वस्य विवक्षितत्वे 'अहम्' इत्यादेरपदत्वप्रसङ्गः । अविव- क्षितत्वे 'देवदत्त' इत्यन्ताकारस्य पदत्वापातः, तस्य विभक्त्यन्तत्वात् । सार्थकस्तथेति चेत्; 'भवति'त्यादौ शवकारादीनां पदत्वप्रसङ्गः, शपः सार्थक- त्वात् । यत्र विहिता विभक्तिस्तदिति चेन्न । शवकारं परित्यज्य पदत्वप्रसङ्गात् । तन्मध्यपतितत्वाच्छबकारोऽपि गृह्यत इति चेत्; तर्हि यत्र विभक्तिर्विधीयते तत्र तद्विभक्तिमध्यपतितं पदमिति वा विवक्षितम्, यत्र विभक्तिर्विधीयते तत्तद्विभक्तिमध्यवर्तिसहितं पदमिति वा ? आद्ये शवकारस्यापि पृथगेव पदत्व- प्रसङ्गः, लक्षणस्य चाव्यापकत्वात् । द्वितीये 'देवदत्तः' इत्यस्यापदत्वप्रसङ्गः , मध्यवर्तिनोऽभावेन मध्यवर्तिसहितविशेषणाभावात् । क्वचिन्मध्यवर्तिसहितस्य क्वचित्केवलस्येति यथासम्भव इति चेन्न । एकानु- गतरूपानभिधाने लक्षणस्याव्यापकतापत्तेर्दुर्निवारत्वात् । किञ्च—'वर्णाः' यहाँ यदि अच् सहित हलों के बहुत्व की विवक्षा करें, तो 'अहम्' इत्यादि पद न कहलायेगा । यदि बहुत्व की विवक्षा न करें, तो 'देवदत्तः' यहाँ 'अः' भी विभक्त्यन्त होने से पद कहा जायगा । समर्थन—'सार्थक विभक्त्यन्त' पद है, अतः 'देवदत्तः' इसका घटक 'अः' पद हो जायगा । खंडन—ऐसा कहने पर 'भवति' का घटक 'अति' भी पद हो जायगा । कारण शप्-प्रत्यय होने से वह सार्थक भी है । समर्थन—'जिससे विभक्ति विहित हो, [ सार्थक विभक्त्यन्त ] वह पद है।' शप् से विभक्ति विहित न होने से वह विभक्त्यन्त पद नहीं होगा । खण्डन—शप् के अकार को त्यागकर 'भूति' एतावन्मात्र पद हो जायगा। लोक में तन्मात्र में पदत्व प्रसिद्ध नहीं है, अतः इष्टापत्ति नहीं कह सकते । समर्थन—'प्रकृति-प्रत्यय के मध्य होने से शप्-विशिष्ट ही पद है।' खंडन—इसमें जहाँ-जहाँ विभक्ति का विधान हो, वहाँ तन्मध्यपतित पद है, यह अर्थ विवक्षित है अथवा जिससे विभक्ति का विधान हो, तन्मध्यपतितयुक्त पद है, यह अर्थ विवक्षित है ? प्रथम पक्ष में शप् का अकार पृथक् ही पद हो जायगा । किञ्च--'भवति' आदि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में 'देवदत्तः' यह पद न कहलायेगा, कारण मध्यवर्ती का अभाव होने से वह तद्विशिष्ट नहीं है । समर्थन—'कहीं-कहीं जिससे विभक्ति विहित हो, मध्यवर्तिसहित विभक्त्यन्त वह पद है' तथा 'कहीं-कहीं जिससे विभक्ति विहित हो, केवल वह विभक्त्यन्त ही पद है।'
किञ्च—‘देवदत्त + सु’ इत्यपि पदं स्यात् । अथ अपशब्दोऽयम्, पदत्वे सति रुत्वादेर्विधानस्यावश्यम्भावित्वादिति चेन्न । यत एवायमपशब्दः, अत एव भवतो दोषः प्रसज्यते—अपशब्देऽपि पदलक्षणं गतमिति । तस्मात् पाणिनिनाऽऽचार्येण शब्दसिद्ध्यर्थं पदसंज्ञेयं रुत्वादिविध्यनुरोधेनापशब्ददशायामन्यैव कृता नदी- संज्ञावत्, न लौकिकपदव्यवहारसिद्ध्यर्थम् । साधुशब्दविशेषे ततश्च तस्यान्यदेव लक्षणं वाच्यम् । अन्यथा दाक्षीनन्दनोदीरितनदीसंज्ञाप्रत्यभिज्ञायां पाथः प्रार्थयमानः काननस्थलीमलीकाभिमानी भवानीहेत । अथोच्यते—विभक्त्यन्तमेव सर्वलक्षणप्रवृत्त्या निष्पन्नं व्यावहारिकं पदमिति लक्षणमस्तु । मैवम् ; सर्वलक्षणप्रवृत्तेः सर्वत्रासम्भवात् । सम्भवत्सर्वलक्षणप्रवृत्त्येति चेन्न । सम्भवत्त्वं तत्काले कालान्तरे वा विवक्षितम् ? आद्ये ‘देवदत्त+रु’ इत्यपि पदं स्यात् रुत्वविधानकाले विसर्गस्यासम्भावितत्वात् । खण्डन — सब लक्ष्यों में एक अनुगत लक्षण न होने से प्रथम लक्षण की द्वितीय लक्षणों के लक्ष्य में और द्वितीय की प्रथम लक्षण के लक्ष्य में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च —‘देवदत्त + सु’ यह भी पद हो जायगा, कारण यह भी विभक्त्यन्त है । समर्थन —यह अपशब्द या अशुद्ध शब्द है, अतएव ऐसा नहीं बोलते । किन्तु पद तो है ही, कारण यदि यह पद न हो, तो रुत्व-विसर्ग कैसे होगा ? खण्डन —अपशब्द है, इसीलिए तो दोष होता है कि अपशब्द में भी आपके पद-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । तस्मात् आचार्य पाणिनि ने शब्दसिद्धि के लिए रुत्व आदि विधियों के अनुरोध से नदीसंज्ञा के तुल्य अपशब्द-साधारण पद का अन्य ही लक्षण किया है । लौकिक पद-व्यवहार की सिद्धि के लिए केवल साधुशब्दविषयक लक्षण नहीं किया है। अतः लौकिक पद का और ही लक्षण करना चाहिए । अन्यथा यदि पाणिनिकृत लक्षण को लोकसाधारण मानें, तो दाक्षीनन्दनकृत नदीसंज्ञा का अनुसन्धानकर अलीक- अभिमानी आप निर्जल काननस्थली को नदी मानकर जल के लिए उसे प्राप्त कीजिये । समर्थन —विभक्त्यन्त ही [ सब लक्षणों की प्रवृत्ति से निष्पन्न ] लौकिक पद है । खंडन —सर्वत्र सब लक्षणों की प्रवृत्ति न होने से असम्भव हो जायगा । समर्थन —जिन-जिन लक्षणों की जहाँ-जहाँ प्रवृत्ति हो, उन सब लक्षणों से निष्पन्न विभक्त्यन्त लौकिक पद है। खंडन —'उस काल में जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति सम्भव हो', यह अर्थ है अथवा 'अन्य काल में भी जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति