खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] उपमान लक्षण का खण्डन २६१ दीर्घः' इति चान्यथा कतमा प्रमा स्यात् । अर्थापत्तिं प्रमाणान्तरमनिच्छताऽपि इयमर्थापत्तिरनुमाने वाऽन्तर्भाव्या पृथक् प्रमाणीकर्त्तव्या वा । एतेन—अप्रतीतगवय-गवान्तरसामान्यस्य अदृष्टान्तानुमानासम्भवात् 'गवये- नानेन सदृशी सा गौरि'ति मितिरुपमितिरित्यपि व्युदस्तम् । तयैतत्सादृश्यस्य एतेन तत्सादृश्यं विनाऽनुपपत्त्यैव सिद्धेरिति । अनवगतसङ्गति-संज्ञासमभिव्याहृतवाक्यार्थस्य संज्ञिन्यनुसन्धानमुपमानमित्यपि न ; प्रस्मृतसङ्गेतेरेवम्भूतोपमित्यव्यापनात् । अस्मृतसंगतीत्यभिधेयमिति चेन्न । अनुभूत-स्मृत-कालान्तरप्रस्मृतसङ्गते- रव्यापनात् । वह दीर्घ है' यह प्रतीति कौन-सी प्रमा होगी ? जो पण्डित अर्थापत्ति को प्रमाणान्तर नहीं मानते, अनुमान में अन्तर्भूत ही मानते हैं, उन्हें 'इससे वह दीर्घ है' इस अर्थापत्ति को अनुमान के अन्तर्गत या पृथक् प्रमाण मानना ही होगा । 'जिस पुरुष को पूर्वकाल में गो-गवय के सादृश्य की प्रतीति नहीं है, उसे दृष्टान्त के न होने से अनुमिति तो होगी नहीं । अतः उस पुरुष की 'इस गवय के सदृश मेरी गौ है' यह प्रतीति उपमान है'—यह कथन भी खण्डित जानना चाहिए । कारण उसे उसके साथ एतत्सादृश्य की [ इसके साथ तत्सादृश्य के बिना ] अनुपपत्ति से ही 'इस गवय के सदृश मेरी गौ है' यह प्रतीति हो सकती है । निर्वचन—नैयायिक कहते हैं कि 'जिस शब्द का संकेत अज्ञात हो, उस शब्द से युक्त वाक्य के अर्थ का शब्द में अनुसंधान उपमान है।' खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण जिस शब्द का संकेत प्रथम तो अवगत हो और पश्चात् विस्मृत हो गया हो, उस शब्द से समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में उपसंहार भी सिद्धान्ततः उपमान है । किन्तु वहाँ सङ्केतज्ञान पहले हो जाने के कारण उक्त लक्षण न जाने से अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस शब्द का संकेत अस्मृत हो, उससे समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में अनुसंधान उपमान है।' प्रकृत में यद्यपि संकेत अवगत है, तथापि स्मृत तो नहीं है, अतः अव्याप्ति नहीं है । खंडन—जहाँ प्रथम तो संकेत अनुभूत हुआ, पश्चात् स्मृत होकर पुनः कालवश विस्मृत हुआ हो, वहाँ भी शब्द में उक्त वाक्यार्थ का अनुसंधान उपमान ही है। किन्तु संकेत में स्मृतिविषयत्व ही है, उसका अभाव नहीं है । अतः वहाँ उक्त लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।