खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्मर्यमाणेति चेन्न। कदाचित् स्मर्यमाणतायारतत्रापि सम्भवात् । सर्वदा अस्मर्यमाणतायाः क्वचिदप्यसम्भवात् । उपमितिप्राक्काल इति चेत् , स्यादेवैतत् यद्युपमितिर्लक्षिता स्यात् । तदर्थमेव तु क्रन्दनमिदं भवतः । किञ्च—सर्वैरनवगतसङ्गतिकत्वस्य प्रकृतेऽप्यसिद्धेः। केनाप्यनवगतसङ्गतित्वस्य वाक्यजेऽपि सम्भवात् । उपमात्रेति च पूर्ववत् निरस्तम् । यस्या प्रमितेर्येन प्रमात्रेति चाभिधाने अनुगतरूपाभावात् व्यक्तौ ऽतनेन लक्षणाननुगत्यापत्तेः । समर्थन—'अस्मर्यमाण ( वर्तमान स्मरण का अविषय ) है संकेत जिस शब्द का, उससे समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में अनुसन्धान उपमान है।' उक्त स्थल में वर्तमान स्मरण नहीं, अतः अव्याप्ति नहीं । खंडन—यदि कदाचित् वर्तमान स्मरण का विषयत्व उक्त स्थल में भी है, अतः वह अव्याप्ति तदवस्थ ही है । सर्वदा वर्तमान स्मरण- विषयत्व का अभाव कहीं भी नहीं है, कारण स्मृति क्षणिक होने से सर्वदा वह वर्तमान नहीं रहती । अतः अलीकप्रतियोगिक होने से उक्त अभाव प्रसिद्ध न हो सकने के कारण असम्भव हो जायगा । समर्थन—'उपमिति से प्राक्-काल में वर्तमान स्मरण का अविषय जो संकेत' आदि कहें, तो कुछ दोष नहीं होगा । खंडन—ऐसा कह सकते, यदि उपमिति की निरुक्ति हो चुकी होती । उपमिति के लक्षण के लिए ही तो आपका यह क्रन्दन है । फिर इस काल में ऐसा परिष्कार कैसे हो सकता है ? किञ्च—सब मनुष्यों से अनवगत संकेत उपमितिस्यल में भी नहीं है और एक-दो- व्यक्तियों से अनवगत संकेत वाक्य से जायमान बोधमात्र में है। अतः सब मनुष्यों से अनवगतत्व की विवक्षा करें, तो असम्भव और एक-दो व्यक्तियों से अनवगतत्व की करें, तो अव्याप्ति हो जायगी । 'उपमितिकर्ता से अनवगत संकेत' आदि तो उपमिति-निरुक्ति से पूर्व कह ही नहीं सकते । यदि कहें कि 'जिस प्रमाता से जिस संज्ञा का संकेत अनवगत है, उससे समभिव्याहृत वाक्यार्थ का शब्द में अनुसन्धान उस प्रमाता के लिए उस शब्द के विषय में उपमान है', तो यत्-तत् शब्द के व्यक्तिपरक होने से जिस व्यक्ति का यत्-शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी ।