भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

२६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यत्र तद्व्यापारो नास्तीति चेन्न । 'स चायञ्च अभिन्नौ' इतिवत् 'स चायञ्च सदृशावि'ति पूर्वप्रतीतस्य प्रतीयमानेन सहैव ऐन्द्रियकसादृश्यप्रतीतावपि प्रसंगात् । इन्द्रियासम्पृक्तस्येति चेन्न । प्रत्यक्षतो गोगवयसादृश्यं प्रतीत्य 'साऽपि च गौर्गवयेन सदृशी, गोत्वादियमिति'त्यनुमितावपि प्रसंगात् । अलिङ्गजापीति चेन्न । नन्वेवं प्रत्यक्षानुमानशब्दानुत्थत्वे सतीत्युक्तं स्यात् । तथा च विशेषणमेव समर्थमित्यप्रतीयमानस्येत्यादि व्यर्थम् । नोपादेयमेव पदान्तरमिति चेन्न । अर्थापत्तेरवश्यं सम्भवात्, तेन सार्धमेत- त्साहश्यस्याननेन सार्धं तत्सादृश्यव्यतिरेकेणानुपपद्यमानत्वात् । अन्यथा प्रत्ययो- त्पत्तिविषयं प्रमाणान्तरमापद्येत । तस्मात् 'अयं ह्रस्वः' इति प्रतीतेः 'अस्मात् स समर्थन — 'जहाँ शब्द का व्यापार न हो, ऐसी उक्त प्रमिति उपमिति और उसका करण उपमान है' ऐसा कहेंगे । खंडन — 'स च अयञ्च अभिन्नौ' इस प्रत्यभिज्ञा की तरह 'स च अयञ्च सदृशौ' यह चाक्षुष प्रत्यभिज्ञा भी होती है । किन्तु अब वह उपमान हो जायगी । समर्थन — 'जहाँ इन्द्रिय का सन्निकर्ष भी न हो, ऐसी उक्त प्रमिति उपमान है ।' खण्डन — जहाँ प्रत्यक्ष से गो तथा गवय के सादृश्य की प्रतीति के अनन्तर 'साऽपि गौः गवयेन सदृशी, गोत्वात्, इयमिव' ऐसी अनुमिति होती है, उसमें उपमानत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । समर्थन — 'लिङ्ग से भी अजन्य उक्त प्रमिति उपमान है' ऐसा कहेंगे । खण्डन — तब तो 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द से जो अजन्य हो — यह अर्थ हुआ । एवञ्च 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द से अजन्य ज्ञान उपमान है' इतना ही लक्षण युक्त है, 'अप्रतीयमानस्य प्रतीयमानेन' इत्यादि विशेष्यदल व्यर्थ हो जायगा । यदि कहें कि 'अप्रतीयमानस्य' आदि विशेष्यांश नहीं ही देना चाहिए, तो भी युक्त नहीं । कारण उपमान का फल अर्थापत्ति से ही सिद्ध है । देखिये — उसके साथ इसका सादृश, इसके साथ उसके सादृश्य के बिना अनुपपन्न है, अतः उसके साथ इसके सादृश्य से इसके साथ तत्सादृश्य का आक्षेपरूप ज्ञान हो जायगा । अन्यथा यदि प्रतीयमान के साथ अप्रतीयमान के सादृश्य की प्रतीति को अर्थापत्ति न मानें (प्रमाणान्तर मानें), तो प्रतीयमान महिष के साथ अप्रतीयमान गौ के वैधर्म्य की प्रतीति भी प्रमाणान्तर कही जायगी । इसी तरह 'उससे यह ह्रस्व है' इस प्रतीति से उत्पन्न 'इससे