खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 306, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] उपमान-लक्षण का खंडन २८६ : न च सादृश्यरूपत्वमनुगतं तेष्वपीत्यदोषः । तथापि सादृश्येन सह सादृश्ये अनेकस्थत्वादौ सादृश्यरूपत्वाश्रिते सादृश्यरूपत्वस्याऽऽश्रयणाभ्युपगमे परस्पराश्रय- भावः, अनभ्युपगमे वाऽननुगमः । तयोः सादृश्यानभ्युपगमे वाऽन्यत्रापि तथापत्तिः । किञ्च--वैधर्म्यप्रतीतेरपि प्रमाणान्तरत्वमेवं स्यात्, अविशेषात् । एवमेवाभ्यु- पगमे च परिगणितप्रमाणाधिक्यप्रसङ्गो वा सादृश्यबुद्धेरपि वा परिगणितेष्वेवान्त- र्भावः स्यादिति । अप्रतीयमानस्य प्रतीयमानेन सह सादृश्यप्रमितिरुपमानमित्यपि न ; आप्त- वाक्यादपि तथा प्रमितेः । समर्थन—सर्वसादृश्य में सादृश्यत्वरूप धर्म अनुगत है । अतः 'सादृश्यत्वविशिष्ट का अनुभव उपमान है' ऐसा लक्षण करने पर हस्तनिष्ठ सादृश्यज्ञान में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन— सादृश्य का अनेकस्थत्वरूप से सादृश्यत्व में जो सादृश्य है, उसमें यदि सादृश्यत्व मानें, तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि सादृश्यत्व न मानें, तो उस सादृश्य के ज्ञान का असंग्रह होने से उसमें उपमान के लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि कहें कि सादृश्य का सदृश्य सादृश्यत्व में हम मानते ही नहीं, तो फिर मुख में चन्द्र का सादृश्य भी न मानिये । कारण सादृश्य के न रहने पर भी यदि सादृश्य के सदृश्य की प्रतीति हो जाती है, तो मुख में भी चन्द्र-सादृश्य की प्रतीति हो ही सकती है । किञ्च—यदि सादृश्यज्ञान को प्रत्यक्षादि से भिन्न प्रमाण मानते हैं, तो 'गोविलक्षणोऽयं महिषः' यह वैलक्षण्य-प्रतीति होने से वैधर्म्यज्ञान भी एक अन्य ( पञ्चम ) प्रमाण हो जायगा । सादृश्य की प्रतीति से वैधर्म्य की इस प्रतीति में कोई विशेष नहीं है, जिससे सादृश्य की प्रतीति को प्रमाण मानें और वैधर्म्य की प्रतीति को प्रमाण न माना जाय । यदि वैधर्म्य की प्रतीति को भी प्रमाण मान लें, तो परिगणित प्रमाण का आधिक्य हो जायगा, अथवा वैधर्म्य की प्रतीति तुल्य सादृश्य की प्रतीति का भी किसी प्रमाण में अन्तर्भाव हो जायगा । समर्थन— मीमांसक कहते हैं कि 'प्रतीयमान ( गवय ) के अप्रतीयमान ( गौ ) में सादृश्य की प्रमिति उपमिति है और उसका करण उपमान है ।' खण्डन— तब तो 'त्वदीया गौः अनेन गवयेन सदृशी' इस आप्तवाक्य से उत्पन्न सादृश्य की प्रमिति भी उपमिति कही जाने लगेगी । ३७