खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अनुभव इत्यभिधाने च 'सदृशाविमौ' इतीन्द्रियजेऽपि प्रसङ्गात् । 'सोऽपि गवयो गवा सदृशो गवयत्वात्, गवयान्तरवदि'त्यनुमानस्यापि तत्त्वापत्तेः । एवमाप्तोक्तिजेऽपि । किञ्च—उपमितिलक्षणमिदमुपमितिकरणलक्षणं वा स्यात् ? नाद्यः; सादृश्य- स्योपमेयत्वापत्तेः । सदृशे चोपमेयव्यवहारोऽस्ति, 'चन्द्रोपमेयं मुखमि'त्यादि । सदृशमितिः सेति चेन्न । अक्षादिकरणासम्भवे तदुदाहरणासिद्धेः । नापि द्वितीयः ; सादृश्यज्ञानस्य सर्वस्यासम्भवत्प्रमाणान्तरव्यापारफल- जनकताया दर्शयितुमशक्यत्वात् । न च सादृश्यमेकमनुगतमस्ति । मुखसादृश्यस्य हस्तसादृश्यस्य च भेदेनैवो- पलम्भात् । नहीं मान सकते । कारण उसके अनन्तर अन्य अनुभव नहीं होता, जो फलरूप उपमिति कहलाये । साथ ही सादृश्य की स्मृति अप्रमा है और उपमिति प्रमा । इसलिए भी सादृश्य की स्मृति को उपमिति ( फलरूप उपमान ) नहीं मान सकते । समर्थन —सादृश्य का अनुभव उपमान है । खंडन—ऐसा करने पर 'सदृशौ इमौ' यह चक्षु आदि से जायमान ज्ञान भी उपमान हो जायगा । इसी तरह 'सोऽपि गवयो गवा सदृशः गवयत्वात्, गवयान्तरवत्' यह अनुमिति तथा 'गोसदृशो गवयः' इस शब्द से जात ज्ञान भी उपमान हो जायगा । किञ्च—'सादृश्य का अनुभव उपमान है' यह लक्षण उपमिति का है या उसके करण का ? प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण तब तो सादृश्य भी उपमेय हो जायगा । 'चन्द्रोपमेयं मुखम्' इस स्थल में सदृश में ही उपमेयव्यवहार होता है, सादृश्यमें नहीं । समर्थन—'सदृश का अनुभव उपमान है ।' खंडन—जहाँ चक्षुरादि, हेतु या शब्दरूप करण न हो, वहाँ सदृश का ज्ञान होता ही नहीं, जो उपमान कहलाये । जहां चक्षुरादि करण हैं, वहाँ सदृश-ज्ञान प्रत्यक्षादि ही है । 'सदृश का अनुभव उपमिति-करणरूप उपमान है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है । कारण जिसमें इन्द्रियादि अन्य प्रमाणों के व्यापार न हों, वैसा उपमितिरूप फल प्रसिद्ध ही नहीं है, जिसके करण को सदृशज्ञानरूप उपमान मानें । किञ्च—सदृशमात्र में अनुगत एक सादृश्य नहीं है; कारण मुख में चन्द्र का सादृश्य तथा हस्त में पल्लव का सादृश्य भिन्न भिन्न होता है, एक नहीं । अतः यदि मुखनिष्ठ सादृश्य के ज्ञान को उपमान कहें, तो हस्तनिष्ठ सादृश्य के ज्ञान में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।