भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

परिच्छेद ] उपमान-लक्षण का खण्डन २८७ पक्षधर्मतया च यदि साध्यव्यक्तिभेदः सिद्धयेत्, तर्ह्यनुमाय तां प्रत्यक्षेण पुरुषद्वयदर्शने तद्विशेषासंशयो स्यात् । प्राग्विgrey/विशेषादर्शनात्तथा स्यादिति चेन्न । पश्चात्तत्र तद्दर्शित्वान्न संशयोतेति । उपमान-लक्षण-खण्डनम् उपमानमपि किमुच्यते ? सादृश्यज्ञानमुपमानमित्येके । तन्न ; स्मृतावपि प्रसङ्गात् । विशेष की आकाङ्क्षा करती है और यही अर्थावसान है, तो सामान्यविषयक प्रतीति ही अधिक की आकाङ्क्षा करती है अथवा अन्य किसी (पक्षधर्मता आदि) अधिक (विशेष) की आकाङ्क्षा करती है ? प्रथम पक्ष में सामान्यबुद्धि के दो व्यापार मानने पड़ेंगे। एक स्वजन्म और द्वितीय विशेष-विषयक आकाङ्क्षा। एवञ्च बुद्धि का बार-बार व्यापार न होने से वह अयुक्त है। द्वितीय पक्ष में व्याप्ति के बल पर सामान्यविषयक प्रतीति एक प्रमिति तथा पक्षधर्मता के बलपर विशेषविषयक अन्य प्रमिति, इस रीति से दो प्रमाण हो जायेंगे। यदि कहें कि सामान्य-विषयक प्रतीति अनुपपन्न नहीं है, किन्तु विशेष की प्रतीति ही पर्वतनिष्ठत्वादि अन्य विशेष के बिना अनुपपन्न है तो पर्वतनिष्ठत्व भी अन्य विशेष के बिना अनुपपन्न है एवं अन्य विशेष भी अन्य विशेष के बिना, इस तरह अनवस्थादोष हो जायगा । यदि पक्षधर्मता से साध्यव्यक्ति का भेद (विशेष) सिद्ध होता, तो अनुमान कर चक्षु से वह्नि के दर्शन-काल में तथा शब्दविशेष से पुरुष का अनुमान कर चक्षु से पुरुषद्वय के दर्शनकाल मे 'यही अनुमित वह्नि व्यक्ति है या अन्य' तथा 'यही अनुमित पुरुष है या अन्य' इत्याकारक सन्देह न होता। यदि कहें कि पूर्वकाल में विशेष का दर्शन (प्रत्यक्ष) नहीं है, अतः सन्देह होता है, तो पश्चात् (इदानीं सन्देहकाल में) विशेष का प्रत्यक्ष है, इसलिए सन्देह न होना चाहिए । सन्देह होता है, इसलिए जानते हैं कि अनुमिति सामान्यविषयक ही होती है; विशेषविषयक नहीं । उपमान-लक्षण का खंडन उपमान भी क्या है ? अर्थात् लक्षण न होने से वह भी अनिर्वचनीय ही है। निर्वचन—कुछ लोग कहते हैं कि 'सादृश्य का ज्ञान उपमान है' ऐसा लक्षण हो सकने से वह अनिर्वचनीय नहीं है। खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो सादृश्य की स्मृति भी उपमान हो जायगी । सादृश्य की स्मृति को उपमितिकरणरूपः उपमान