भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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२८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

पक्षधर्मता-लक्षण-खण्डनम् भवतु वा यः कश्चन पक्षः, केयं पक्षधर्मता ? पक्षाश्रितेतेति चेन्न। नैयायिकादीन् प्रति प्रमेयत्वस्याहेतुत्वप्रसङ्गात्। विषय- विषयिभावस्य ज्ञेयज्ञानरूपातिरिक्तस्यानङ्गीकारात् । तयोश्च ज्ञेयाश्रितत्वायोगात् । प्रतीतिं व्याप्तिबलेन सामान्यतो व्यापकावगाहनप्रवृत्तां विशेषमादाय परं पर्यवसाययितुं व्याप्तस्य सामर्थ्यं सेति चेन्न। तस्याः सामान्यविषयायाः अनुप- पत्तेरसिद्धेर्व्याप्तिवत्सम्भवात् । अनुपपत्तित्वे व्याप्त्यनुप्रवेशात्, अधिकविषयाकाङ्क्षित्वे विरम्य व्याप्रा- रापत्तेः, मानान्तरत्वापत्तेर्वा । विशेषविषयायाश्च अनुपपत्तित्वेऽतिप्रसङ्गात् । इससे वह भी निरस्त हो गया, कारण सन्देह के विशेषणत्व या उपलक्षणत्व दोनों कल्पों में दोष कह आये हैं । किञ्च—'वादी का सन्देह या प्रतिवादी का ?' ऐसा विकल्प- कर पूर्वोक्त युक्ति से भी वह अयुक्त है । पक्षधर्मता-लक्षण का खण्डन अथवा छोड़ दें, पक्ष कुछ भी वस्तु हो, किन्तु यह पक्षधर्मता कौन-सी वस्तु है ? निर्वचन—पक्षमें आश्रितत्व ( वृत्तित्व ) ही पक्षधर्मता है । खण्डन—तब तो नैयायिक आदि के मत में प्रमेयत्व हेतु न कहलायेगा । कारण नैयायिक विषय-विषयी- भावरूप प्रमेयत्व को ज्ञेय और ज्ञान के स्वरूप से अतिरिक्त नहीं मानते । पक्षरूप ज्ञेय, ज्ञान प्रमेय के आश्रित नहीं, आत्मादि-आश्रित हैं । निर्वचन—व्याप्ति के बल सामान्यरूप से व्यापक को विषय करनेवाली प्रतीति को विशेष में पर्यवसित ( निराकाङ्क्ष ) करनेवाली जो व्याप्य की सामर्थ्य है, वह पक्षधर्मता है ।' खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं है । कारण सामान्य- विषयक प्रतीति विशेष की प्रतीति के बिना अनुपपन्न ही नहीं है; क्योंकि जैसे 'जो-जो धूमवान् है वह-वह वह्निमान् है' यह सामान्यविषयक व्याप्तिज्ञान विशेष की प्रतीति के बिना ही होता है । इसी तरह अनुमिति भी विशेष की प्रतीति के बिना ही होगी । यदि विशेष की प्रतीति के बिना सामान्य की प्रतीति को अनुपपन्न मानें, तो व्याप्ति की प्रतीति भी विशेषविषयक हो जायगी । एवञ्च कतिपय विशेषों का अनुप्रवेश हो तो अननुगम होगा और अशेष विशेषों का प्रवेश होने पर सर्वज्ञतापत्ति या अनुमानोच्छेद हो जायगा; क्योंकि व्याप्तिसिद्धि से ही सभी विशेष सिद्ध होंगे । यदि कहें कि विशेष के बिना सामान्यविषयक प्रतीति अनुपपन्न नहीं, किन्तु वह