खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] पक्षता-लक्षण का खण्डन २८५ तथा अनवधारणं यत्किञ्चिद्धेतुविषयधर्मगोचरम्, वादिप्रयोक्तव्यहेतुविषय- गोचरं वा ? न तावदाद्यः ; अग्निमत्त्वनिश्चयदशायामपि तत्तद्धेतुविषयबहुतरापर- धर्मानवधारणात् धूमं प्रति पर्वतस्य पक्षत्वप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; तथापि तत्र प्रसङ्गात् । तद्धेतूनामपि वादिप्रयोज्यत्वात् । असाधारणविवक्षायाश्च अननुगमात्, इतरेतराश्रयदोषारच । पक्षधर्मत्वेन हेतुत्वनिरूपणात्, व्याप्तपक्षधर्मत्वस्य हेतुत्वात्, हेतुना च पक्षनिरूपणात् । स्वार्थानुमाने च हेतोरप्रयोज्यत्वात्, पक्षाभावेनानुमानानुदयप्रसङ्गात विरुद्ध- हेतौ पक्षस्याभासत्वप्रसङ्गात् । तत्र साध्यस्य तद्धेतुविषयत्वाभावात्, हेतोरेव च साध्य- विपरीतव्याप्त्या दुष्टत्वात् । एतेन सन्दिग्धसाध्यधर्मा धर्मी पक्षः ; साध्यस्त्वञ्च स्वपरार्थानुमानसाधारण- मुत्पाद्यज्ञानत्वमिति निरस्तम् । इसी तरह यत्किञ्चित् हेतुविषय धर्म का अनवधारण अपेक्षित है या वादिप्रयोक्तव्य हेतुविषय धर्म का अनवधारण ? प्रथम पक्ष में अग्नि का निश्चय होने पर भी तत्-तत् अन्य हेतुविषय बहुत-से धर्मों का अनिश्चय होने से धूम के प्रति पर्वत पक्ष हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण अग्नि की निश्चय दशा में भी वादिप्रयोक्तव्य धूमरूप हेतु के विषय श्यामत्व-प्रदेशवत्त्व आदि धर्मों का अज्ञान है ही । अथवा अन्य हेतु भी कदाचित् वादी से प्रयोक्तव्य है ही । यदि कहें कि 'वादिप्रयोक्तव्य धूमरूप हेतु के विषय वह्निरूप धर्म का अनवधारण जहाँ हो, वह पक्ष है,' तो साध्य-साधनभेद से पक्ष-लक्षण का भेद होने से लक्षण में अननुगम दोष हो जायगा । किञ्च—अन्योोन्याश्रय दोष भी होगा । कारण व्याप्ति-पक्षधर्मताविशिष्ट को ही हेतु कहते हैं, अतः पक्ष से हेतु का और हेतु से पक्ष का निरूपण है । किञ्च—स्वार्थानुमान में हेतु का प्रयोग भी नहीं होता, अतः पक्ष न होने से अनुमिति नहीं होगी । किञ्च—विरुद्ध हेतु में पक्षधर्मत्व का अभाव हो जायगा; कारण वहाँ साध्य हेतु का विषय ( व्यापक) नहीं होता, किन्तु साध्यभाव से व्याप्य होने से ही हेतु दुष्ट होता है । 'जहां साध्य का सन्देह हो, वह पक्ष है' और साध्य वही है, जो स्वार्थ-परार्थ अनुमिति-साधारण जायमान ज्ञान का विषय हो'—ऐसा कुछ लोग कहते थे । किन्तु