खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकार्थावच्छिन्नपदसमुदायो वाक्यमिति चेन्न । एकत्वविषयत्वावच्छिन्न- त्वानां वाच्यानि दूषणानि तावत्सन्तु, पदपदार्थं तु चिन्तयामः । सुप्तिङन्तं पदमिति केचित् । वर्णा विभक्त्यन्ताः पदमित्यन्ये । तत्र नाद्यः ; प्रत्येकं मिलितस्य चाव्यापकत्वात् । पृथक्प्रवृत्तिनिमित्ततायाश्च वाक्यलक्षणाव्यापकत्वापातात् । नापि द्वितीयः ; विभक्त्यर्थस्यानुगतस्यासम्भवात् 'विभक्तिरि'त्यनेन सुप्तिङोः , 'प्राग्दिशोऽविभक्ति'रित्यनेन च तसिलादेः पृथक् पृथगेव विभक्तिसंज्ञाविधानात् शब्दसाम्येन च लक्षणाऽयोगात् । निर्वचन—'एक अर्थ से अवच्छिन्न अर्थात् एक अर्थ का वाचक पदसमुदाय वाक्य है ।' खंडन—एकत्व, अर्थत्व और अवच्छिन्नत्व में वक्तव्य दोष संप्रति रहने दें । अर्थात् सम्प्रति क्या एकत्व संख्यारूप है या द्वित्वादिविरहरूप ? इसी तरह अवच्छि- न्नत्व भी विशेषण-विशेष्यसम्बन्धत्व-से अतिरिक्त है या अनतिरिक्त ? दोनों ही विकल्प नहीं बन सकते, यह सब चतुर्थ परिच्छेद में विचारा जायगा । यहाँ केवल पद शब्द के अर्थ का विचार करते हैं कि पदशब्द का अर्थ क्या है ? निर्वचन—कोई आचार्य 'सुप्तिङन्तं पदम्' यह पद का लक्षण करते हैं । अन्य आचार्य 'विभक्त्यन्त वर्ण' को पद कहते हैं । खण्डन—इनमें प्रथम लक्षण युक्त नहीं है, कारण यदि सुबन्त को पद कहें, तो तिङन्त में और यदि तिङन्त को पद कहें, तो सुबन्त में अव्याप्ति हो जायगी । यदि सुप्तिङन्त को पद कहें, तो सुप्तिङ दोनों किसीके अन्त में नहीं हैं, अतः असम्भव हो जायगा । यदि 'सुबन्तं पदम्, तिङन्तं पदम्' इस रीति से दो लक्षण करें, तो सुबन्त 'पद है इस लक्षण की तिङन्त में और तिङन्त पद है, इस लक्षण की सुबन्त में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण 'विभक्तिश्च' इससे सुप्-तिङ् की और 'प्राग्- दिशोऽविभक्तिः इससे तसिलादि की पृथक्-पृथक् विभक्ति-संज्ञा होने से विभक्तिशब्द का अनुगत अर्थ नहीं है। अतः शब्दसम होने से केवल सुबन्त-तिङन्त में समन्वित विभक्त्यन्त वर्ण पद है, यह लक्षण हो नहीं सकता । अन्यथा यदि यह लक्षण मानें, तो सुपरहित केवल तसिलन्त भी पद हो जायगा ।