खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] उपमान लक्षण का खण्डन २६५ अव्याप्तविषयप्रमाफलकमिति विशेषणीयमिति चेन्न । वस्तुगत्याऽव्याप्तत्व- स्योपमेयेऽप्यभावात् । व्याप्ततयाऽनवगम्यमानस्येति च कृते यत्प्रति तल्लिङ्गं तेन सह व्याप्तत्वावगतमुपमितिकरणमपि न व्याप्नुयात् । उपमेयेन सह व्याप्तत्वानवगतत्वोक्तावप्यनुमाने प्रसङ्गस्तदवस्थः । अनुमे- येन सहेति कृते च तदनपायाद्व्याप्तिस्तदवस्थैव । संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रमितिकरणमिति चेन्न । तथात्वासिद्धेः, अर्थापत्त्यादित- स्तत्सिद्धेर्वक्ष्यमाणत्वात् । रूप धर्म तद्व्यवहार्यत्वानुमिति के उत्पादक लक्षणवाक्य के अर्थ के अनुसन्धान में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्त (लिङ्ग) जिसका विषय न हो, ऐसा जो [प्रमाफलक उक्त वाक्यार्थ के संज्ञी में ] अनुसन्धान है, वह उपमान है।' अतः लक्षण-वाक्यार्थ के अनुसन्धान में अतिव्याप्ति नहीं, कारण पृथिवीत्व से व्यवहार्यत्व का व्याप्त गन्धवत्त्व आदि लिङ्ग उक्त अनुसन्धान के विषय हैं। खण्डन—ऐसा मानने पर 'स एवायं गोसदृशो गवयः' इत्याका- रक अनुसन्धान भी उपमान न कहलायेगा, कारण पदार्थत्व आदि से व्याप्त ही गोसादृश्य उक्त अनुसन्धान का विषय होता है। यदि कहें कि 'व्याप्तत्वरूप से ज्ञात है विषय जिसका, ऐसा [प्रमाफलक उक्त वाक्यार्थ का] अनुसन्धान उपमान है । गोसादृश्य व्याप्त होने पर भी व्याप्तत्वरूप से ज्ञात नहीं है; अतः अव्याप्ति नहीं', तो जिस काल में पदार्थत्व के व्याप्तत्वरूप से गोसादृश्य अवगत होता है, उस काल में उसका अनुसन्धान उपमान न कहा जायगा। समर्थन—उपमेय के साथ व्याप्तत्वरूप से अनवगम्यमानविषयक उक्त अनुसन्धान उपमान है। गोसादृश्य, उपमेय गवय से व्याप्तत्वरूप से अवगत नहीं है, अतः अव्याप्ति नहीं । खंडन—गन्धवत्त्व भी उपमेय के साथ व्याप्तत्वरूप से अनवगम्यमान नहीं है, अतः लक्षणवाक्यार्थ का अनुसन्धान भी उपमान हो जायगा । यदि अनुमेय के साथ व्याप्तत्वरूप से अनवगम्यमान कहें, तो जिस काल में गोसादृश्य पदार्थत्व के साथ व्याप्तत्वरूप से अवगत है, उस काल में 'स एवायं गोसदृशो गवयः' यह अनुसन्धान उपमान नहीं कहलायेगा । समर्थन—'संज्ञा और संज्ञी के सम्बन्ध की प्रमिति का कारण जो उक्त अनुसं- धान है, वह उपमिति है।' खंडन—तब तो लक्षणवाक्यार्थ का अनुसन्धान भी उपमान हो जायगा । किञ्च—संज्ञा-संज्ञिभाव की प्रमिति, अर्थापत्ति या अनुमान से ही सिद्ध है। अतः उक्त अनुसन्धान उसका कारण नहीं । .