खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रतीत्युत्पत्तिं प्रति प्रयोजकीभूतं यावत् , तावद्वाक्यं विवक्षितमिति चेन्न । अन्तर्भावितवनाधिकरणतादृशप्रतिपत्तिं प्रति तस्यापि प्रयोजकत्वात् । उपमिति प्रतीति तु पूर्ववन्निरस्तमिति । यावत् संज्ञासंज्ञिबुद्ध्यौपयिकं तावद्विवक्षितमिति चेन्न । लक्षणसहचरितसंज्ञो- पदेशार्थानुसन्धानेऽपि प्रसङ्गात् । किञ्च—यदा तर्कानुसन्धानविरहिणः सत्यप्येवंविधानुसन्धाने सादृश्यमेव गवयपदप्रवृत्तिनिमित्तमिति मितिः फलमुत्पद्यते, तदा तस्याप्रमाकरणस्यापि उपमानत्वमापद्यते । प्रमाफलकमिति विशेषणप्रक्षेपपक्षे चानुसंहितरूपव्यवहार्यता- नुमित्युत्पादेनापि एतादृशानुसन्धानमुपमानं स्यात् । समर्थन—'प्रतीति की उत्पत्ति का प्रयोजक जितना वाक्य हो, तदर्थ का अनुसन्धान उपमान है।' 'सदृशो गवयः' यह वाक्य प्रतीति में प्रयोजक नहीं है, अतः उसमें अति- व्याप्ति नहीं है । खंडन— वन भी जिसका विषय है, ऐसी प्रतीति का प्रयोजक 'गोसदृशो गवयः प्रायो महति कानने दृश्यते' यह वाक्य भी है। किन्तु दैववश जहाँ उक्त वाक्यगत कानन पदार्थ का स्मरण नहीं हुआ, उस स्थल में वाक्यार्थ का अनुसन्धान न होने से 'उपमिति का प्रयोजक जितना अंश हो, उतना ही उक्त लक्षण में वाक्य है'—यह नहीं कह सकते । 'उपमितिरूप प्रतिपत्ति के प्रति प्रयोजक' इत्यादि तो कह नहीं सकते; क्योंकि वह तो पूर्ववत् निरस्त हो जायगा । अर्थात् उपमिति की निरुक्ति के पूर्व ऐसा कह ही नहीं सकते । समर्थन—संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध की बुद्धि का प्रयोजक यावत् अंश हो, उक्त लक्षण में वाक्यशब्द से तावन्मात्र की विवक्षा मानेंगे, तो कोई दोष नहीं होगा । खण्डन— 'गन्धवती पृथिवी' इस लक्षणवाक्य के श्रवण के बाद गन्धयुक्त व्यक्ति का प्रत्यक्ष होने पर जो 'सेयं गन्धवती पृथिवी' यह अनुसन्धान होता है, उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। कारण यहाँ भी अज्ञात-संकेत-समभिव्याहृत वाक्यार्थ का संज्ञी में अनुसन्धान है ही । किन्तु यह व्यतिरेकी अनुमान है, उपमान नहीं । किञ्च—लाघवरूप तर्क का अनुसन्धान न होने पर 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य के श्रवण के बाद गोसदृश व्यक्ति का प्रत्यक्ष होने पर जहाँ 'स एवायं गोसदृशो गवयः' यह अनुसन्धान होता है, उस स्थल में 'गोसादृश्य ही गवय पद का प्रवृत्तिनिमित्त है' ऐसा ज्ञान होता है । उस अप्रमा का करण भी उपमान हो जायगा । यदि कहें कि 'प्रमिति के जनक उक्त वाक्य के अर्थ का अनुसन्धान उपमान है', तो अनुसंहित जो पृथिवीत्व-