भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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२६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अननुमितिजनकं तादृक् प्रतिसन्धानमुपमानमिति चेन्न। तज्जातीयस्यानु- मितिजनकत्वात्। व्यक्त्यपेक्षायाञ्च जनकत्वस्य सामान्याकारपर्यवसायिनो नित्यं व्यक्तावसम्भाविततया अननुगमेन चायुक्तत्वादिति। किञ्च—गोसादृश्यं विहाय गवयत्वजातौ गवयशब्दार्थताप्रतीतिः कल्पना- लाघवाख्यं तर्कमपास्य न स्यादिति तदुपन्यासस्थितौ किमानुमानिक्येव तत्र गवय- त्वस्य गवयपदवाच्यताप्रमितिरियं नेष्यते। सम्भवति हि प्रयोगः—विमतिपदं गवयशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं तथात्वे तर्केणविषयीक्रियमाणविपर्ययकत्वात्, न यदेवं न तदेवं यथा गोत्वम्, तथा चेदम्, ततस्तथे'ति। न ह्यस्ति सम्भवो मूलशैथिल्यादि- दोषविरहिततर्कनिवेदितविपर्ययश्चार्थो न च तथेति। समर्थन—'अनुमिति का अजनक उक्त अनुसन्धान उपमान है।' खण्डन—इसका क्या अर्थ है, क्या जिस अनुसन्धान का सजातीय अनुमिति का अजनक हो, यह अर्थ है या जो अनुसन्धान व्यक्ति अनुमिति का अजनक हो, यह अर्थ है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण 'स एवायं गोसदृशो गवयः' इस अनुसन्धान का सजातीय अन्य अनुसन्धान भी कदाचित् अनुमिति का जनक हो सकता है। द्वितीय कल्प भी अयुक्त है; कारण सामान्यरूप से गृहीत जनकत्व [ फलोपधायकत्व न हो, किन्तु स्वरूपयोग्यत्व ] सभी व्यक्तियों में अवश्य रहता है। अतः कोई भी व्यक्ति अनुमिति का अजनक न होने से असम्भव हो जायगा । साथ ही लक्षण में व्यक्ति का प्रवेश होने से व्यक्ति- भेद से लक्षण के भेद होने के कारण अननुगम हो जायगा । किञ्च—गोसादृश्य को छोड़कर गवयत्व-जाति में गवयशब्दार्थत्व की कल्पना लाघवरूप तर्क के बिना हो नहीं सकती । जब उपमान में भी लाघवरूप तर्क की अपेक्षा ही है, तो जिस अनुमान को सभी मानते हैं, उसीमें लाघवरूप तर्क को सहकारी क्यों न माना जाय ? पञ्चावयव के प्रयोग का भी सम्भव है। देखिये—'विप्रतिपत्ति (सन्देह) का विषय गवयत्व गवयशब्द की प्रवृत्ति का निमित्त है, गवयत्व के प्रवृत्तिनिमित्तत्व में तर्क से अविषयीकृत विपर्यय होने से, जो गवयशब्द का प्रवृत्तिनिमित्त नहीं है, वह तर्क से अविषयीक्रियमाण विपर्ययक नहीं है, जैसे गोत्व अथवा गोसादृश्य, यह गवय तर्क से अविषयीक्रियमाण विपर्ययक है, अतः गवयशब्द का प्रवृत्तिनिमित्त है।' यह सम्भव नहीं कि कोई अर्थमूलशैथिल्य आदि दोषों से रहित तर्क से निवेदित विपर्ययक हो और प्रवृत्ति में निमित्त न हो।