खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एतत्तदुच्यते—व्यावहारिकीं प्रमाणादिसत्तामादाय विचारारम्भ इति । तस्माद् यादृग्व्यवहारनियमः कृतः, तन्मर्यादा अनेन नोल्लंघितेति यद्वादिग्व्यवहारे मध्यस्थावगमः स विजयते; यस्य तु वचसि नैवं तस्यावगमस्तस्य पराजयः; यत्र वायुक्तनिग्रहसत्त्वावगमः स निगृहीतः; तदितरस्तु न तथेत्यादिनियम एव कथारम्भाय ग्राह्यः । अथ शून्यवाद्-विचारः अनेन नियमेन वक्तव्यमित्यस्य अयमर्थः—अनेन नियमेनोक्तमनेनेति मध्यस्थावगमस्य विषयीभवितव्यमिति। न च वाच्यमन्ततस्तदवगमस्यापि मनाङ्- भ्युपेयेति; तस्यापि सत्ताचिन्तायां तत्सत्तावगमान्तरस्यैव शरणत्वात् । अतः आकाश-पुष्पायमान उसको शास्त्रार्थ का हेतु न भी मानें तो हानि क्या है ? कुछ मनुष्यों के कुछ काल में अबाधित ज्ञान से ही प्रायः सभी लौकिक व्यवहार देखे जाते हैं । अर्थात् कुछ मनुष्यों के कुछ काल में अबाधित प्रमाणादि-ज्ञान ही कथाङ्ग हैं । इसलिए यह फलित हुआ कि व्यावहारिकी प्रमाणादि-सत्ता को मानकर विचार (कथा) का आरम्भ करना चाहिए । तस्मात् 'जैसा व्यवहार-नियम किया गया है, इसने उसकी मर्यादा (सीमा) का उल्लंघन नहीं किया, ऐसा जिस वादी के वाग्व्यवहार में मध्यस्थ को ज्ञान हो, वही विजय पाता है; जिस वादी के वचन (वाग्व्यापार) में मध्यस्थ को ऐसा ज्ञान न हो, वह पराजय पाता है; जिस वादी के वचन में मध्यस्थ को प्रतिवादी द्वारा उक्त निग्रहस्थान् का ज्ञान हो, वह पराजित होता है और जिस वादी के वचन में निग्रहस्थान का ज्ञान न हो, वह पराजित नहीं होता है- इत्यादि नियम ही कथारम्भ के लिए ग्राह्य हैं। शून्यवाद-विचार ज्ञातव्य है कि जैसे वेदान्ती प्रमाण, प्रमेय आदि सभी पदार्थों की प्रातिभासिक सत्ता मानते हैं—अर्थात् घट-पट आदि का भासना ही उनकी सत्ता है, इससे अन्य सत्य-सत्ता नहीं है—वैसे ही शून्यवादी भी सबको प्रातिभासिक मानते हैं। भेद इतना ही है कि वेदान्ती प्रतिभास को सत्य मानते हैं और शून्यवादी प्रतिभास की सत्ता भी प्रातिभासिक ही मानते हैं। उनका कहना है कि जैसे घटादि की सत्ता 'घटः' इत्याकारक ज्ञान ही है, वैसे ही 'घट:' इस ज्ञान की सत्ता भी 'ज्ञातो घट:' ज्ञान यह ही है, अन्य नहीं ।