भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार १५ न चैवमनवस्था; तदनुसरणावश्यम्भावानङ्गीकारात् । 'एवं त्रिचतुरज्ञानजन्मतो नाधिका मतिः' इति न्यायात् । न चान्तिमासत्त्वे पूर्वप्रवाहासात्त्वापत्तिः, तथा च अवगममादायापि व्यवहरतो न निस्तार इति वाच्यम् । अस्तु एवं हि । तथापि त्रिचतुरज्ञानकक्षागवेषणमात्र- यहाँ संक्षेप से उनके मत का विचार करते हैं । इस वितण्डा-शास्त्रार्थ में शङ्का या खण्डनकर्ता नैयायिक हैं और समाधानकर्ता बौद्ध । शङ्का—प्रमाणादि-स्वीकार को शास्त्रार्थ का हेतु न मानने से लाभ क्या हुआ ? जब आपने व्यवहार-नियम को शास्त्रार्थ-हेतु मान लिया, तो इसीसे द्वैत सिद्ध हो गया । समाधान—हम व्यवहार-नियम की सत्ता भी प्रातिभासिक ( स्वप्न-पदार्थ के तुल्य प्रतिभासमात्र ) ही मानते हैं । अर्थात् 'इस नियम से कथन करना चाहिए' इस वाक्य का यह भाव है कि 'इस नियम से इसने कथन किया है' ऐसा मध्यस्थ को ज्ञान होना चाहिए । इससे द्वैत नहीं होगा । शङ्का—अन्ततः आपको समय-बन्ध के ज्ञान की सत्ता तो मान लेनी होगी ? समाधान—ज्ञान-सत्ता की चिन्ता होने पर ज्ञान का ज्ञान ही शरण है । अर्थात् ज्ञान की सत्ता भी प्रातिभासिक ही है । शंका—समय-बन्ध ( विषय ) की सत्ता के लिए ज्ञान और उस ज्ञान की सत्ता के लिए अन्य ज्ञान इस प्रकार अनवस्था१ हो जायगी ? समाधान—ज्ञान का ज्ञान अवश्य हो, ऐसा नियम नहीं है । 'तीन या चार ज्ञान से अधिक ज्ञान नहीं होते' यह भट्ट का न्याय है । अर्थात् 'अयं घटः', 'ज्ञातो घटः' इससे अधिक ज्ञानधारा अनुभवसिद्ध नहीं है । शंका—जिस अन्तिम ज्ञान का ज्ञान नहीं हुआ, उसकी प्रातिभासिक सत्ता न होने से समय-बन्ध ( विषय ) तक प्रवाह का असत्त्व हो जायगा ? समाधान—ऐसा ही हो क्या हानि है ? विचार से ऐसा ही सिद्ध होता है अर्थात् शून्यवाद ही ठीक है । शंका—ऐसा होने पर प्रातिभासिक सत्ता को मानकर भी व्यवहर्ता के व्यवहार का निर्वाह कैसे होगा ? समाधान—सबके शून्य होने पर भी तीन या चार ज्ञानों की कक्षा के गवेषणमात्र में विश्रान्त और पंचमादि कक्षा के अन्वेषण से रहित विचार से ही समय बाँधकर १ अवस्था = स्थिति, उसके अभाव को 'अनवस्था' कहते हैं । यह एक दोष है; कहीं भी विश्राम न होने से किसी वस्तु का निर्णय न हो पाना ही इसके दोषत्व का कारण है ।