भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन ३०३ कालान्तरेऽपीति पक्षे 'देवदत्त' इत्यपि पदं न स्यात्, इत्यादिपदपूर्वकालभाविनो यत्वयलोपादेरकरणात् । शब्दान्तरसन्निधिव्यतिरेकेण यद्भावि लक्षणं तद्विवक्षितमिति चेन्न । 'जीविका- कृत्य व्याचष्टे' इत्यर्थे 'जीविकां कृत्वा व्याचष्टे' इति प्रयुज्यमानं वाक्यं स्यात् । एकार्थाविच्छिन्नपदसमुदायस्य तत्रापि गतत्वात् । कृत्वेत्यनेन सम्बद्धस्य जीविका- मित्यस्योक्तपदलक्षणेन सङ्गृहीतत्वात् । यदुपाधिका यल्लक्षणप्रवृत्तिस्तदुपाधिसम्पत्तौ तेन निष्पन्नं तथेति चेन्न । यत्र नास्त्युपाधिसम्पत्तिस्तत्र केवल तस्यां सत्यामित्यस्याभावादपदत्वापत्तेः । यस्यामवस्थायां यस्य लक्षणस्योपनिपातस्तत्सर्वसम्पत्तौ विभक्त्यन्तं पदमिति का सम्भव हो', यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में 'देवदत्त+रु' यह भी पद हो जायगा, कारण रुत्वविधानकाल में विसर्ग की प्रवृत्ति तो है नहीं और जिन-जिन सूत्रों की प्रवृत्ति है, वे प्रवृत्त हो चुके हैं। द्वितीय पक्ष में 'देवदत्तः' यह भी पद न कहलायेगा, कारण उसके साथ 'इति' आदि जोड़ने पर यत्व, यलोप आदि की प्रवृत्ति की भी सम्भावन है, किन्तु वे अभी प्रवृत्त नहीं हुए हैं। समर्थन—'शब्दान्तर-सन्निधान के अभावकाल में जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति हो, उन-उन लक्षणों की प्रवृत्ति से निष्पन्न पद है।' खण्डन—'जीविकाकृत्य व्याचष्टे' इस अर्थ में प्रयुक्त 'जीविकां कृत्वा व्याचष्टे' यह भी वाक्य हो जायगा । कारण 'कृत्वा' इससे सम्बद्ध 'जीविकाम्' यह उक्त पद लक्षण से संगृहीत हो जाने से वह एक अर्थ से अवच्छिन्न पदसमुदायरूप वाक्य है ही। समर्थन—'जिन-जिन कारणों से जिन-जिन सूत्रों की प्रवृत्ति हो, उन-उन कारणों की सम्पत्ति होने पर उन-उन सूत्रों की प्रवृत्ति से निष्पन्न ही पद है। और औपम्यरूप अर्थ तथा 'कृत्वा' और 'जीविकाम्' इन दो पदों के परस्पर सन्निधानरूप कारण से गति- संज्ञा-समासल्यप् की प्रवृत्ति होती है। अतः इन सूत्रों की प्रवृत्ति होने पर ही उक्त वाक्यघटक पद होंगे, अन्यथा नहीं । खंडन—जहाँ औपम्यादि कारण नहीं हैं, वहाँ 'उपाधिसम्पत्तौ सत्याम्' इस लक्षणांश का समन्वय न होने से पदत्व नहीं होगा। समर्थन—'जिस अवस्था में जिन-जिन सूत्रों की प्रवृत्ति हो, उन उन-उन सूत्रों की प्रवृत्ति होने पर उस अवस्था में विभक्त्यन्त पद है।' खंडन—लक्षण में 'अवस्था' पद से अवस्था-विशेष का ग्रहण है या अवस्था-सामान्य का ? यदि