खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम चेन्न । यस्यामवस्थायामित्यवस्थानां भिन्नभिन्नाकारेण परामर्शे लक्षणस्याननुगमा- दव्यापकतादोषः । अवस्थानामैक्यमविवक्षितमसम्भावितं च । सर्वदा सर्वावस्था- विषये लक्षणप्रसङ्गादिति । स च 'भवति, भवति, भवतीति, भवत्यस्तीति, पटः पटा- विति, पटं पट इति चे'त्यतिव्याप्तिः । एतेन — अपौरुषेयं वाक्यं तदित्यपि निरस्तम् । अर्थापत्ति-लक्षण-खण्डनम् का पुनरर्थापत्तिरपि ? अवस्था-विशेष का ग्रहण करें, तो जिस 'देवदत्तः' इस अवस्था का लक्षण में निवेश होगा, उससे अन्य यज्ञदत्त आदि अवस्थाओं में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण अवस्थामात्र में ऐकरूप्य अविवक्षित तथा असम्भावित है । अन्यथा सब अवस्थाओं में, सब कालों में सब लक्षणों की प्रवृत्ति हो जायगी । अर्थात् यदि अवस्थाओं का ऐक्य पदों की एकरूपतारूप है, तो 'भवति' यह तिङन्त तथा 'भवति' सप्तम्यन्त तथा 'भवति' सम्बोधन तीनों की एक अवस्था होने से 'भवति' इस अवस्था में प्रवृत्त सब लक्षणों की प्रवृत्ति किसी 'भवति' में नहीं है, अतः तीनों में अपदत्व हो जायगा । यदि अर्थैकरूप अवस्थाओं का ऐक्य हो, तो 'अस्ति, भवति' इन दोनों की एक अवस्था होने से उस अवस्था में प्रवृत्त सब लक्षणों की एक में प्रवृत्ति न होने से अव्याप्ति हो जायगी । यदि एकविभक्तिकत्वरूप अवस्थाओं का ऐक्य हो, तो 'पटः पटौ' इन दोनों में प्रथमारूप एक विभक्ति होने से एक-अवस्था हो जायगी और उस अवस्था में प्रवृत्त सभी लक्षणों से प्रत्येक की निष्पत्ति न होने से अव्याप्ति हो जायगी । यदि प्रातिपदिक का ऐक्यरूप अवस्थाओं का ऐक्य है, तो 'पटम्, पटः' इन दोनों की एक-अवस्था में प्राप्त सब लक्षणों से प्रत्येक की निष्पत्ति न होने से अव्याप्ति हो जायगी । पद तथा वाक्य की निरुक्ति न होने से ही अपौरुषेय वैदिकवाक्य प्रमाण-शब्द है, यह लक्षण भी खण्डित जानना चाहिए । अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डन अर्थापत्ति क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से मीमांसक का अभिमत अर्था- पत्ति-प्रमाण भी अनिर्वचनीय ही है ।