खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५परिच्छेद ] अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डन ३०५ अन्यथानुपपत्तिरिति चेन्न । यतोऽन्यत्वं तत्सिद्धेरग्रे तदसिद्धेः । सिद्धे नानुषपत्तिरिति चेन्न । विशेषणव्यवच्छेद्याप्रतीतौ तद्वैयर्थ्येन तदनुपा- दाने सर्वथाऽनुपपत्त्यर्थतायां फलविरोधात् । केनाप्यनुपपत्त्यर्थत्वे साध्यसिद्ध्य- पर्यवसानात् । निर्वचन—‘अन्यथा ( बहिःसत्त्व के बिना ) जीवित देवदत्त के गृह में असत्त्व की अनुपपत्ति अर्थापत्ति प्रमाण है' ऐसा लक्षण हो सकने से वह अनिर्वचनीय नहीं है । खंडन—जिस बहिःसत्त्व के बिना अनुपपत्ति है, उसकी पहले से ही सिद्धि होने से आगे अर्थापत्ति प्रमाण की सिद्धि ही नहीं हो सकती । अर्थात् बहिःसत्त्वान्यथात्वरूप उपपादक का ज्ञान प्रतियोगिज्ञानाधीन होने से पहले बहिःसत्त्व ज्ञात होना ही चाहिए । फिर तो बहिःसत्त्वरूप अर्थापत्ति का कोई प्रयोजन ही नहीं रहा । समर्थन—देवदत्त का बहिःसत्त्व अर्थापत्ति का फल है और सामान्यतः सिद्ध बहिः- सत्त्व के बिना अनुपपत्ति अर्थापत्तिरूप करण है । अतः सामान्यतः बहिःसत्त्व की प्रथम से सिद्धि होने पर भी कुछ हानि नहीं है । खंडन—यदि विशेषतः असिद्ध देवदत्तीय बहिःसत्त्व के व्यवच्छेदार्थ 'सिद्धेन' यह विशेषण है, तो पूछा जा सकता है कि वह व्यवच्छेद्य प्रसिद्ध है या नहीं ? यदि हाँ, तो फल पहले से ही सिद्ध होने से अर्थापत्ति व्यर्थ है । यदि वह प्रसिद्ध नहीं है, तो व्यवच्छेद्य का अभाव होने से ही उक्त विशेषण व्यर्थ है । यदि वह विशेषण न देकर अनुपपत्तिमात्र को अर्थापत्ति कहें, तो फल के साथ विरोध हो जायगा । अर्थात् 'सर्वप्रकारेण अनुपपत्तिमात्र' को करण कहें, तो अनुपपत्ति शब्द का फल के साथ विरोध होने से उपपादक प्रमा अनुपपन्न हो जायगी, कारण वह भी सर्वान्तःपाती है। एवञ्च लक्षण में असंभव हो जायगा । यदि 'केनापि प्रकारेण अनुपपत्तिमात्र'को करण कहें, तो वैसा करण चाहे कुछ भी फल सिद्ध कर सकता है, 'देवदत्तीय बहिःसत्त्व' रूप साध्य की सिद्धि में ही उसका पर्यवसान हो नहीं सकता । १ जहाँ ज्योतिषशास्त्र से 'वर्षशतजीवी देवदत्तः' ऐसा ज्ञान होने पर 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्' ऐसा सामान्यतो दृष्ट अनुमान होता है, फिर अनुपलब्धि प्रमाण से 'देवदत्तो गृहे नास्ति' ऐसा ज्ञान होता है, वहाँ 'देवदत्तस्य गृहे असत्त्वे सति वर्षशतजीवित्वं बहिःसत्त्वं विना अनुपपन्नम्, इति तेन बहिःसत्त्वं कल्प्यते' ऐसा ज्ञान होता है । यहाँ पर अन्यथानुपपत्ति प्रमाणरूप अर्थापत्ति है और बहिःसत्त्वकल्पन फलरूप अर्थापत्ति है । 'अर्थस्य आपत्तिर्यस्याः' इस व्युत्पत्ति से प्रमाण में और 'अर्थस्य आपत्तिः' इस व्युत्पत्ति से प्रमा में अर्थापत्ति शब्द का प्रयोग होता है । मीमांसक प्रत्यक्षादि चार प्रमाणों से पृथक् अर्थापत्ति को पञ्चम प्रमाण मानते हैं । उसीका खण्डन यहाँ करते हैं । ३६