खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 323, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रमाणयोर्विरोधानुपपत्तिरिति चेन्न । असिद्धत्वात् । प्रमाणत्वेनाभिमन्य- मानयोरिति । अभिमतेर्भ्रमार्थत्वेऽतिप्रसङ्गात् । ज्ञानार्थत्वेऽप्युक्तदोषानिवृत्ति- रेव । अनिर्णीत प्रामाण्याप्रामाण्ययोरित्यत्रापितथैव । तथाहि—सत्प्रतिपक्षेऽपि तस्य तदुपपादकः फलकत्वापत्तेः । तत्र विरोधे व्याहत्याैकाप्रामाण्यनिश्चयः, यत्र तु नैवं तद्विवक्षितमिति चेन्न । एवं सत्प्रतिपक्षवदन्यत्रापि विरोधार्थत्वेनैवाभासत्वाविशेषात् । समर्थन—ज्योतिःशास्त्र से 'वर्षशतजीवी देवदत्तः' ऐसा निश्चय होने पर 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्' यह सामान्यतो दृष्ट अनुमान और 'देवदत्तः गृहे नास्ति' यह अनुपलब्धि दोनों प्रमाणों का बहिःसत्त्व-कल्पना के बिना परस्पर विरोध होना अनुप- पत्ति या अर्थापत्ति है, जो बहिःसत्त्वरूप फल की कल्पनाकर शान्त हो जाती है । खण्डन—प्रमाणों में परस्पर विरोध कहीं भी देखा नहीं गया है, अतः ऐसा लक्षण अयुक्त (असंभव समर्थन—अपने-अपने विषय में शूर होने से भले ही प्रमाणों में विरोध न हो, प्रमा- णत्वेन अभिमतों में विरोध की अनुपपत्ति अर्थापत्ति है, ऐसा कहेंगे, तब तो असंभव न होगा। खण्डन—'अभिमत' शब्द का अर्थ क्या है, क्या भ्रम है, क्या ज्ञान है या ऐसा ज्ञान, जिसका प्रामाण्य-अप्रामाण्य अनिश्चित हो ? तीनों पक्षों में दोष होगा । यदि अभिमत का अर्थ भ्रम कहें, तो अतिप्रसंग हो जायगा। अर्थात् माला में एक को 'सर्पोऽयम्' यह भ्रान्ति हुई, तो दूसरे को 'दण्डोऽयम्' । एवञ्च यहाँ भी दोनों में विरोधानुपपत्ति होकर उपपाद- कान्तर की कल्पना अर्थापत्ति होने लगेगी । यदि ज्ञान अर्थ मानें, तो भी उक्त दोष बना ही रहेगा, अर्थात् उस ज्ञान को प्रमाण मानेंगे, तो विरोध ही असिद्ध होगा और यदि अप्रमाण या प्रमाण-अप्रमाणसाधारण मानें, तो पहले पक्ष का ही दोष रहेगा । तृतीय पक्ष में भी वैसा ही अतिप्रसंग है । देखिये—यदि ज्ञानों के विरोध की अनुपपत्ति से उपपादक की कल्पना करें, तो 'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्, शब्दो नित्यः श्रावणत्वात्' इस सत्प्रति- पक्षस्थल में भी ज्ञानों का विरोध अनुपपन्न होकर किसी अन्य उपपादक की कल्पना करेगा । अर्थात् वहाँ भी अर्थापत्ति का लक्षण अतिव्याप्त हो जायगा । समर्थन—सत्प्रतिपक्ष-स्थल में विरोध होने पर व्याघात होने से एक के अप्रामाण्य का निश्चय होता है । किन्तु अर्थापत्ति-स्थल में बहिःसत्त्व की कल्पना से भी उपपत्ति हो जाती है, व्याघात नहीं होता । अतः वहा एक के अप्रामाण्य का निश्चय नहीं होता । हमें यहाँ ऐसा ही विरोध विवक्षित है । खंडन—जैसे सत्प्रतिपक्ष-स्थल में विरोध