भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

परिच्छेद ] अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन १०६ नापि चतुर्थः; तद्धि प्रतीयमानविरोधिद्वयतिरिक्तत्वम्, अन्यद्वा स्यात् ? नान्त्यः; तत्प्रतीतौ सामर्थ्यानुपदर्शनेन अनियमप्रसङ्गात् । न प्रथमः; अनुगताननु- गतजातिव्यक्तिचाक्षुषाचाक्षुपादिव्यक्तिगन्धादितादात्म्यवादिनये तदुभयप्रमाता- दात्म्यविषयताव्युदासं विना विरोधासिद्ध्या तद्गमणिकात्वस्यैवासिद्धेः । तदुभयप्रतीतौ च तदवधारणे प्रागेव तत्प्रतीतौऽर्थापत्त्यनुवादतापत्तेः । अनुपलब्धिलक्षण-खण्डनम् योग्यानुपलम्भोऽभावप्रमाकरणमित्यप्ययुक्तम्; प्रमाणाभावस्य तथात्वे चतुर्थ कल्प भी युक्त नहीं है । कारण वह धर्म क्या है, प्रतीयमान विरोधी धर्म- ( गृहसत्त्व ) व्यतिरिक्तत्व ( बहिःसत्त्व ) है या उससे अन्य ही कोई धर्म है ? इनमें द्वितीय पक्ष तो युक्त नहीं है ; कारण उक्त धर्म का अन्यत्वरूप से ज्ञान होने पर भी विशेषरूप से ज्ञान न होने से उसमें अर्थापत्ति की सामर्थ्य कह नहीं सकते । प्रथम पक्ष भी अयुक्त है, कारण जो ( आचार्य ) अनुगत जाति और अननुगत व्यक्ति का तथा चाक्षुष व्यक्ति और अचाक्षुष गन्ध का तादात्म्य मानते हैं; उनके मत में देवदत्त के सत्त्व- असत्त्व का भी गृह के साथ तादात्म्य ही है । अतः उन दोनों का विरोध ही नहीं है । फिर वह विरुद्धत्व प्रतीति से बहिःसत्त्व का गमक कैसे होगा ? जो धर्म और धर्मी का भेद मानते हैं, उनके मत में भी धर्मी का भेद धर्मी के विरोध की प्रतीति के साथ ही ज्ञेय है या नान्तरीयक होने से अनुमान का विषय है । अतः इस कल्प में भी अर्थापत्ति अनुवादक होने से प्रमाण नहीं हो सकती । अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन 'योग्य अनुपलब्धि अभाव-प्रमा का करण है—यह भी अयुक्त है; कारण यदि उपलब्धि शब्द का अर्थ प्रमा हो, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम से पूर्व रजतत्व की स्मृतिरूप ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति होने पर भी रजतत्व की प्रमा का अभाव ही है । अतः अनुप- लब्धिरूप कारण होने से 'इदं न रजतम्' ऐसी अभाव-प्रमा ही होनी चाहिए, 'इदं १ 'भूतले घटः, भूतले पटः' इत्यादि व्यवहार से जैसे घटादि भावों को बाह्य पदार्थ मानते हैं, वैसे ही 'भूतले घटाभावः, भूतले पटाभावः' इत्यादि व्यवहार से भेदवादी अभाव को भी बाह्य पदार्थ मानते हैं। भेद यह है कि नैयायिक उसे प्रत्यक्षसिद्ध मानते हैं, तो मीमांसक चक्षुरादि सन्निकर्ष न होने से इस अभाव-प्रमा को अनुपलब्धिप्रमाणजन्य मानते हैं। यहाँ उसी अनुपलब्धि प्रमाण का खण्डन करते हैं।