खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विभ्रमानुदयप्रसङ्गात् । उपलम्भाभावमात्रस्य तथात्वे शङ्खधवलिमप्रतिसन्धानवतः पीतभ्रमानुदयप्रसङ्गात् । कालभेदात्तत्राविरोध इति चेन्न। तथापि संसृष्टयोरन्योन्याभावाग्रहण- प्रसङ्गात्, तादात्म्यस्य स्वरूपमात्रानतिरेकात् । अभावस्फुरणे च तत्प्रतिभानस्य ध्रौव्यात् । किञ्च—योग्यता हि तत्तदविनाभूतान्यप्रतियोगिप्रमापकसाकल्यमिष्यते । रजतम्' ऐसा भ्रम नहीं होना चाहिए । यदि उपलम्भ शब्द का ज्ञानमात्र अर्थ करें, तो यद्यपि 'इदं रजतम्' इस विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही भ्रमस्थल में दोष नहीं है, कारण प्रत्यक्ष में सन्निकर्ष के बिना भान न होने से भ्रम से पूर्व ज्ञानलक्षणा सन्निकर्ष के सम्प- त्त्यर्थ रजतत्व की स्मृति अवश्य माननी पड़ेगी । अतः रजतत्वोपलब्धि का अभावरूप कारण न होने से 'इदं न रजतम्' यह अभाव-प्रमा नहीं होगी [ किन्तु 'इदं रजतम्' यह भ्रम ही होगा । ] फिर भी 'श्वेतः शंखः' ऐसा स्मरण रखनेवाले को विरोधी ज्ञान होने से पीतत्वस्मृति नहीं रहती । एवञ्च वहाँ पीतत्वोपलम्भाभावरूप कारण होने से 'पीतो न शंखः' यह अभाव-प्रमा ही होनी चाहिए, 'पीतः शंखः' यह भ्रम नहीं होना चाहिए । समर्थन—'पीतः शङ्खः' इस भ्रम में पीतत्व का भान पीतत्वस्मृतिरूप ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति के बिना हो नहीं सकता । अतः अनुभव के अनुरोध से कल्पना करेंगे कि उक्त स्मृति के जनक संस्कार के उद्बोधक पित्तादि दोष से ही 'श्वेतः शङ्खः' इस पूर्वद्वितीयक्षणवर्ती प्रतिसन्धान का प्रतिबन्ध भी होता है । अर्थात् प्रतिबन्धक के न होने से भ्रम से पूर्वक्षण में पीतत्व-स्मृति है। अतः अनुपलब्धिरूप कारण न होने से अभाव की प्रमा नहीं होती, किन्तु 'पीतः शङ्खः' ऐसा भ्रम ही होता है । खंडन—तब तो चक्षुःसंयुक्त घट-पटादि के अन्योन्याभाव का प्रत्यक्ष न होगा । कारण अभाव-प्रत्यक्ष में प्रतियोगी के प्रत्यक्ष का अभाव कारण है और अन्योन्याभावग्रह-स्थल में सर्वत्र नियमतः प्रतियोगी का प्रत्यक्ष रहता है । 'तादात्म्य अन्योन्याभाव का प्रतियोगी है, घट-पट नहीं' यह नहीं कह सकते, कारण घट-पट का तादात्म्य घट-पटरूप होने से यदि तादात्म्य उसका प्रतियोगी है, तो घट-पट भी प्रतियोगी ही हैं । इसी प्रकार 'घटः पटात्मा न' इत्याकारक अन्योन्याभाव के प्रत्यक्षस्थल में सर्वत्र नियमतः घट-पट की प्रतीति ही रहती है । अतः यदि अनुप- लब्धि को कारण मानें, तो अन्योन्याभाव का कहीं भी प्रत्यक्ष नहीं होगा । किञ्च—प्रतियोगी और उससे व्याप्त प्रतियोगिसन्निकर्षादि से अन्य प्रतियोगी प्रमाजनक आलोकादि का समूह ही योग्यता है । ऐसा मानने पर जहाँ भाव (प्रति-