भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१५ हेत्वाभासखण्डने असिद्ध-लक्षण-खण्डनम् कश्चायमसिद्धो नाम ? तथाहि—व्याप्तिपक्षधर्मत्वाभ्यामप्रमितोऽसिद्ध इत्यलक्षणम्; हेत्वाभासान्तराणामपि ह्यसिद्धप्रवेश एवं सति स्यात्। व्याप्तिं पक्षधर्मतां तत्प्रमिति वा न विरुन्धतां हेतुदोषत्वासम्भवात् । ननु नेदमीदृशम् । तथाहि—केचिद् दोषा व्याप्तिपक्षधर्मतातत्प्रमितिविरहा- हेत्वाभास के खंडन में असिद्ध-लक्षण का खंडन 'सामान्यतो विशेषाभावोऽसिद्धः' यह जो पीछे कहा है, वहाँ असिद्ध भी क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से अनिर्वचनीय है । निर्वचन—व्याप्ति और पक्षधर्मता से जो अप्रमित हो, वह असिद्ध है । खण्डन—ऐसा मानने पर विरुद्ध आदि अन्य हेत्वा- भासों का भी असिद्ध में ही प्रवेश हो जायगा । कारण व्याप्ति तथा पक्षधर्मता और उनकी प्रमिति के जो विरोधी नहीं, वे हेतु-दोष ही नहीं कहे जा सकते । विरुद्धादि हेतुदोष हैं, अतः वे व्याप्ति तथा पक्षधर्मता और तत्प्रमिति के विरोधी अवश्य हैं । एवञ्च विरोधी होने से वे व्याप्ति-पक्षधर्मता से अप्रमित हैं ही । समर्थन—ऐसा बात नहीं है। देखिये—कोई दोष व्याप्ति-पक्षधर्मता और तत्प्र- मिति के अभावरूप हैं, कोई व्याप्ति आदि के अभाव के अनुमापक हैं, तो कोई १ यहाँतक प्रमाण-सामान्य का लक्षण और उसके विशेष प्रत्यक्ष, अनुमानादि के लक्षणों का विस्तार के साथ खण्डन किया जा चुका । अब प्रसंगतः प्रमाणाभासों का भी खण्डन कर रहे हैं, जिनमें अनुमानाभास या हेत्वाभासों का यह खण्डन आरम्भ हो रहा है । यहाँ सहज ही यह शंका उठती है कि जब प्रमाणाभासों का ही खण्डन करना है, तो प्रत्यक्षाभासों का खण्डन ग्रन्थकारने क्यों नहीं किया ? किन्तु इसका समाधान यही है कि न्यायसूत्रकार ने भी शब्दतः प्रत्यक्षाभासों का निरूपण नहीं किया है। अतः अलग से उनका खण्डन आवश्यक नहीं है । ग्रन्थकारों ने तत्तत् प्रसंग में उनका उल्लेख अवश्य किया है, तो यहाँ भी प्रसंगतः तत्तत् स्थलों में उनका खण्डन किया ही गया है। इसके विपरीत हेत्वाभास कथाङ्ग होने के कारण सूत्रकार ने उन्हें कण्ठतः कहा है । अतएव उनका यहाँ प्रधान रूप से खण्डन किया जा रहा है । यदि कहें कि संशय भी उन्होंने कण्ठतः कहा है, तो उसका भी प्रत्यभिज्ञा-खण्डन के समय कुछ खण्डन किया ही गया है, शेष चतुर्थ परिच्छेद में भी होगा। हेत्वाभासों में भी सव्यभिचार, विरुद्ध, सत्प्रतिपक्षित, असिद्ध, बाधित—यह क्रम होने पर भी यतः यहाँ पीछे 'सामान्यतः विशेषाभावोऽसिद्धः' कहा गया है, अतः प्रकृततया बुद्धिस्थ होने से पहले असिद्ध का ही खण्डन प्रस्तुत किया जा रहा है। यद्यपि भेदस्थापना के लिए हेत्वाभासों का उपन्यास करना वादी का स्ववधार्थ उद्यम ही माना जायगा, क्योंकि उनका सहज परिहार हो जाने से वादी निगृहीत हो जायगा । अतः उसके हेत्वाभासों का खण्डन आवश्यक नहीं। फिर भी उन्हीं हेत्वाभासों को लेकर द्वैतापत्ति तो आ ही सकती हैं। इसलिए उनका यहाँ खण्डन उचित ही है ।