खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
त्मानः, केचित्तु व्याप्त्यादिभङ्गे लिङ्गभूताः, प्रतिबन्धकतयाऽनुमित्युत्पत्तिं निरुन्धा- नाश्च केचिद्दोषभूयं भजन्ते । तत्र प्रथमे तावदसिद्धमध्यमध्यासते । तद्यथा— व्याप्यत्वासिद्धः सोपाधिरूपः, अनौपाधिकसम्बन्धिता हि व्याप्तिः, सहोपाधिता चानुपाधिताविरहरूपैव । एवमधिकरणासिद्धिरपि असिद्धावेवान्तर्भाविष्णुः, पक्षपदोपात्तस्याऽऽश्रयस्य व्यतिरेकरूपा हि सा । सिद्धसाधनमपि तथैव । सिषाधयिषितधर्मविशिष्टो हि पक्ष उच्यते । यच्च सिद्धं न तत्र सिषाधयिषाऽस्ति । ततो विशेषणाभावायत्तो विशिष्टपक्षरूपस्य तत्राभावः । न च वाच्यं यथा सव्यभिचारत्वादङ्गव्याप्तिकमिति पृथगेव सव्यभिचारस्य दोषत्वम् , तथाऽसिद्धत्वात्तत्र सिषाधयिषा नास्तीति सिद्धत्वस्यापि पृथगेव दोषत्वं प्राप्नोति, लिङ्गद्वारेणासिद्धिपर्यवसायित्वात् । अन्यथा व्याप्त्यादिविरहपर्यवसायित- मात्रेण सव्यभिचारत्वादीनामप्यसिद्धावेवान्तर्भावः स्यादिति । यतः सिषाधयिषाभावो न प्रतिपत्रा सिद्धत्वाल्लिङ्गाद्गम्यते । किं नाम ? प्रतिबन्धक होने से अनुमिति का निरोध करते हैं । उनमें प्रथम दोष असिद्ध के मध्य आता है, कारण व्याप्यत्वासिद्ध सोपाधिरूप है । अनौपाधिक सम्बन्ध ही व्याप्ति है और अनौपाधित्वविरह ही सोपाधित्व है । इसी प्रकार अधिकरणासिद्धि भी असिद्ध के मध्य अन्तर्भूत होने योग्य है, कारण वह पक्ष पद से उपात्त आश्रय का व्यतिरेकरूप है । ऐसे ही सिद्धसाधन भी असिद्ध के मध्य अन्तर्भूत है । कारण सिषाधयिषित ( सिद्धिविषयक इच्छा का विषय ) धर्मविशिष्ट ही पक्ष कहा जाता है । जो सिद्ध है, उसमें सिषाधयिषा नहीं होती । तस्मात् विशेषण ( सिषाधयिषा ) के अभाव से प्रयुक्त विशिष्टरूप पक्ष का भी वहाँ अभाव है ही । प्रश्न—'जैसे 'यह हेतु नष्टव्याप्तिक है, सव्यभिचार होने से' ऐसी अनुमिति होने के कारण असिद्ध से पृथक् ही सव्यभिचारत्व दोष होता है, वैसे ही साध्य के सिद्ध होने से सिषाधयिषा नहीं होती, अतः सिद्धत्व भी असिद्धि से पृथक् ही दोष होना चाहिए । सिद्धत्व का हेतुरूपता द्वारा असिद्धि में पर्यवसान है। यदि सिद्धसाधन को पृथक् दोष न मानें, तो व्याप्त्यादि के विरह में पर्यवसित होने से सव्यभिचार आदि का भी असिद्ध में ही अन्तर्भाव हो जायगा । उत्तर—प्रतिपत्ता ( ज्ञाता ) को सिद्धत्वरूप हेतु से सिषाधयिषाभाव का ज्ञान नहीं होता, किन्तु इच्छाभावरूप उसका ज्ञान न्यायमत में प्रत्यक्ष से और मीमांसक के