खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च वाच्यं यत्र लिङ्गात्सोपाधितादेः प्रतीतिरतीन्द्रियप्रभृतिविषये, तत्र तल्लिङ्गं पृथगेव दूषणतयाऽभिधीयताम्, न ह्यनैकान्तिकत्वादिकमपि सार्वत्रिकं व्याप्तिविरहलिङ्गमिति हेत्वाभासाधिक्यमापन्नमिति । अनैकान्तिकत्वादिवत्तेषां लिङ्गानामैकरूप्येण निर्देशतुमशक्यात्, पृथक् पृथगेव वाऽभिधानमशक्यमपरिस- ङ्ख्येयत्वादिति । वक्ष्यामश्चाग्रे हेतुं तदनभिधानस्य । नन्वनुचितमुच्यते व्याप्त्यादिविरहलिङ्गतया अनैकान्तिकत्वादीनां पृथग्दूषण- त्वमिति, यतो व्याप्तिपक्षधर्मतोपेतलिङ्गप्रमितिसाध्यानुमितिस्तद्वैकल्यान्न भवेत् । यतश्च सा न भवति, तदेव तस्यां दूषणं वक्तुं युक्तम्—‘इदमनुमित्युत्पत्तिकारणमिह नास्ती’ति । न च व्याप्तिपक्षधर्मते तत्प्रमितिश्च विहायान्यत् तदुत्पत्तिकारणमस्ति व्यतिरेकोपदर्शनयोग्यम् । तस्मादनुमितिदोषप्रतीतिकारणत्वमनैकान्तिकत्वादीनाम्, प्रश्न—अतीन्द्रिय स्थल में जहाँ ( ‘अध्वरे हिंसाऽधर्मसाधनम्, हिंसात्वात्, ब्राह्मण- हिंसावत्’ यहाँ निन्दितत्व हेतु से ज्ञायमान निषिद्धत्व-उपाधिक स्थल में ) लिङ्ग से सोपाधित्व की प्रतीति होती है, वहाँ उस लिङ्ग को असिद्धि से पृथक् दूषण कहना चाहिए । यदि कहें कि यहाँ सोपाधिकत्व-ज्ञान लिङ्ग द्वारा होने पर भी सर्वत्र लिङ्ग से वह ज्ञान नहीं होता, अतः पृथक् हेत्वाभास नहीं होगा, तो यह भी ठीक नहीं । कारण व्यभिचार भी सर्वत्र व्याप्तिविरह का लिङ्ग नहीं है, विरुद्धादि से भी कहीं-कहीं व्याप्तिविरह का ज्ञान होता ही है । एवञ्च व्यभिचार भी पृथक् दोष न होने लगेगा । अतः यह हेत्वाभासाधिक्य हो ही गया । उत्तर—अनैकान्तिक के तुल्य उन लिङ्गों का एकरूप से निर्देश नहीं हो सकता और असंख्येय होने से पृथक् पृथक् निर्देश भी असंभव है । अतः सोपाधित्व के लिङ्ग पृथक् हेत्वाभास नहीं हैं । इसके अन्य भी हेतु आगे कहे जायेंगे । प्रश्न—‘व्याप्ति आदि के विरह का लिङ्ग होने से अनैकान्तिक आदि पृथक् दूषण हैं’ आपका यह कथन अनुचित है, कारण व्याप्तिपक्षधर्मताविशिष्ट लिङ्ग की प्रमिति से साध्य की अनुमिति होती है और उसके वैकल्य में नहीं होती । एवञ्च जिनसे अनुमिति नहीं होती, उन्हींको अनुमिति में दोषरूप से कहना उचित है कि ये अनुमिति के कारण यहाँ नहीं है । व्याप्ति, पक्षधर्मता, तत्प्रमिति से अन्य अनुमिति का कारण नहीं है, जिनका व्यतिरेक अनुमिति के व्यतिरेक में ही देखा जा सकता है । तस्मात्