भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 338

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२१ न तु साक्षाद्दोषत्वम् । दोषप्रतिपादकतयाऽपि च दोषत्वं साक्षाद्दोषत्वमनुपजीव्या- शक्याभिधानमिति प्रधानदोषस्यैव दोषतयोद्भावनं युक्तम्, न सव्यभिचारत्वा- दीनामिति विभागसूत्रमनर्थकमिति । सत्यमेतत् । साक्षाद्दोषत्वं प्रतिबन्धकस्य व्याप्त्यादिविरहस्य वा । विरुद्धत्वा- दीनां तु तत्प्रमापकतया यद्यपि दोषपक्षनिक्षेपः; तथापि विरुद्धत्वादयो यद्दोषप्रति- पादकतयोक्तास्तदुद्भावनलाघवानुरोधात् । व्याप्त्यादिविरहे तत्रोद्भाव्यमाने न हेतुर्मन्तुं शक्यते । अनैकान्तिकत्वादौ तु उद्भाविते व्याप्त्यादिविरहोऽर्थाद् गम्यते, व्याप्त्यादि- विरहव्यतिरेकेण अनैकान्तिकत्वादेरनुपपन्नत्वात् । यथा 'तस्माद्दीर्घोऽयम्' अनैकान्तिक आदि अनुमिति-दोषों का प्रतीति में कारण हैं, साक्षात् दोष नहीं हैं। जो दोष-प्रतिपादक होने से दोष हैं, उनका अभिधान साक्षात् दोष के उपजीवन के बिना अशक्य है । अतः प्रधान दोष का ही दोषरूप से अभिधान युक्त है, सव्यभिचार आदि का दोषरूप से कथन युक्त नहीं । एवञ्च सव्यभिचार आदि हेत्वाभास-भेदप्रतिपादक गौतमीय विभाग-सूत्र अनर्थक है । उत्तर—आपकी यह शङ्का युक्त ही है, साक्षाद्दोष तो अनुमिति-प्रतिबन्धक सत्प्रति- पक्ष या व्याप्ति आदि के विरह ही हैं । विरुद्ध आदि की भी व्याप्त्यादि-विरह के प्रमापक होने से ही दोषों में गणना है । फिर भी विरुद्ध आदि को जो पृथक् दोषरूप में कहा गया है, वह उद्भावन में लाघव होने से ही है । वे अपनी प्रतीति में अन्य की अपेक्षा नहीं करते, यही उद्भावना-लाघव है । यदि कहें कि फिर तो व्याप्त्यादि-विरह को ही दोष मानिये, क्योंकि प्रधान वे ही हैं और उनमें एतादृश लाघव भी है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण ‘अनयोर्न व्याप्तिः’ इस प्रकार व्याप्त्यादिविरह का उद्भावन करेंगे, तो ‘कुतः’ यह हेत्वाकांक्षा बनी रहेगी और उसके रहते इसका ज्ञान नहीं हो सकता । याने व्याप्त्यादिविरह अनैकान्तादि हेतुदोष-विशेष से व्याप्त होने के कारण उन्हें भी उसके साथ कहना होगा और इस तरह गौरव हो जायगा । इस पर यह नहीं कह सकते कि ‘तुल्ययुक्त्या अनैकान्तादि का उद्भावन करने पर भी व्याप्त्यादि-विरह का ज्ञान न हो सकने से तत्कल्पनाकृत गौरव होगा ही। कारण अनैकान्तिक स्थल में यदि अनैकान्तिक का उद्भावन करें, तो व्याप्त्यादि का विरह ४१