खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२३ विरुद्धादिषु लक्षणं किं नास्ति, किं वाऽस्ति ? यदि नास्ति, तदा व्याप्तिपक्षधर्म- ताभ्यां प्रमिता विरुद्धादयः प्राप्नुवन्ति । अथास्ति तदा तेऽप्यसिद्धभेदाः प्राप्ताः । अथैतस्मिँल्लक्षणे सत्यपि ते नासिद्धान्तर्भूताः, तर्हि लक्षणमिदमतिव्यापकमपन्नम् । अथ यत्र व्याप्तिपक्षधर्मत्वाप्रमितत्वं साक्षादुद्भाव्यते तदसिद्धमित्युच्यते, तर्हि लक्षणान्तरमिदमुक्तं स्यात् । न चैतदपि युक्तम्; यत्र व्याप्यत्वासिद्धेर्व्याप्तिविरहमात्रं प्रतिपाद्यते, तत्र व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितत्वानां हानं मिलितं नोद्भाव्यत इति नासावसिद्धः स्यात् । एवं सर्वासिद्धविशेषमुदाहृत्य प्रसङ्गो विधातव्यः । अथ प्रत्येकमिदं लक्षणम्—व्याप्त्यप्रमिततया साक्षादुद्भाव्योऽसिद्धः, पक्ष- धर्मत्वाप्रमिततया चेति ; तर्हि अन्योन्योदाहरणाव्याप्तेरव्यापकत्वमुभयोः । अथो- भयोरप्यसिद्धविशेषलक्षणत्वात् अन्योन्यविषयाव्यापकता न दोषायेति मन्यसे । न; सामान्यलक्षणे निर्वक्तुमशक्ये कथमिदं विशेषलक्षणमपि घटते । यदि नहीं, तो विरुद्धादि तो व्याप्तिपक्षधर्मता से प्रमित उपलब्ध होते हैं, उनकी क्या गति होगी ? यदि यह विरुद्धादि-साधारण है, तो विरुद्धादि भी असिद्ध के ही भेद सिद्ध हुए । यदि इस लक्षण का समन्वय होने पर भी विरुद्धादि को असिद्ध में अन्तर्भूत न मानें, तो प्रस्तुत लक्षण अतिव्याप्ति दोष से दूषित हो जायगा । समर्थन—'जिसमें व्याप्ति-पक्षधर्मता से प्रमितत्व का अभाव साक्षात् उद्भावित हो, वह असिद्ध है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन---फिर तो यह लक्षणान्तर हुआ, अतः प्रतिज्ञाहानिरूप आपका निग्रह हुआ । किञ्च—व्याप्यत्वासिद्ध में केवल व्याप्ति का ही विरह उद्भावित होता है । एवञ्च वहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमितत्व का अभाव उद्भावित न होने से वह असिद्ध नहीं कहलायेगा । इसी तरह आश्रयासिद्ध और स्वरूपासिद्ध में केवल पक्षधर्मता का विरह ही उद्भावित होने से उनमें भी उक्त लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—प्रत्येक यह लक्षण है अर्थात् 'व्याप्ति की प्रमिति के अभाव का जहाँ साक्षात् उद्भावन हो, वह असिद्ध है' तथा 'पक्षधर्मता की प्रमिति के अभाव का जहाँ साक्षात् उद्भावन हो, वह असिद्ध है' इस प्रकार दो लक्षण करेंगे । खंडन—ऐसा करने पर प्रथम लक्षण की आश्रयासिद्ध में और द्वितीय लक्षण की व्याप्यत्वासिद्ध में अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि ये लक्षण असिद्धविशेष के हैं, अतः अव्याप्ति नहीं है, तो सामान्य-लक्षण के निर्वचनीय न होने पर विशेष-लक्षण का भी निर्वचन हो नहीं सकता; कारण सामान्य-ज्ञान के बिना विशेष की जिज्ञासा ही नहीं होती ।