भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 341

३२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ अनुमितेरसाधारणहेतुव्यतिरेकोद्भावनं सामान्यलक्षणमस्तु । मैवम्; सत्प्रतिपक्षोद्भावनं तथेत्यतिव्याप्तेः । भावरूपतया हेतुविशेषणे च निरुपाधित्व- व्यतिरेकोद्भावनाव्याप्तेः । स्वरूपासिद्धिः सर्वप्रमाणसाधारणो दोष इत्यत्र तदुद्भावनाव्याप्तेश्च । अथोच्यते-व्याप्तत्वपक्षधर्मताभ्यां प्रमितत्वस्य व्यतिरेको यत्र साक्षादुपन्य- स्यते, सोऽसिद्ध इति । इदमप्यलक्षणम्; अव्यापकत्वात् । यत्र व्याप्त्यादिव्यतिरेक उपन्यस्यते, तत्र वस्तुगत्या व्याप्तत्वप्रमितेर्व्यतिरेकोऽस्तु नाम, न तु उपन्यस्यतेऽपि, प्रयोजनाभावात् । व्याप्तिव्यतिरेकदर्शनादेव अनुमानाङ्गवैकल्यात्मनो दोषस्योद्भा- वनपर्यवसानात् । तस्मात्तत्र प्रमितत्वव्यतिरेकोद्भावनं नास्तीत्यव्यापकत्वं दोषः । ननु विशेषणाद्यभावोऽपि वस्तुतो विशिष्टाभाव एवेति नोक्तदोषः । न; यदि विशेषाणाद्यधिको विशिष्टः, तदा तदभावभेदोऽपि स्यात् । अथ नाधिकः, तदा समर्थन–'अनुमिति के असाधारण कारण के अभाव का उद्भावन असिद्ध है,' ऐसा सामान्य-लक्षण करेंगे । खंडन—अनुमिति का असाधारण कारण असत्प्रतिपक्षत्व भी है और उसका अभाव सत्प्रतिपक्षत्व है । अतः सत्प्रतिपक्ष का उद्भावन भी असिद्ध हो जायगा । यदि कहें कि 'अनुमिति के भावरूप असाधारण कारण अभाव का उद्भावन असिद्ध है', तो व्याप्यत्वासिद्ध में अव्याप्ति हो जायगी । कारण अनुमिति का असाधारण कारण अनौपाधिकत्व भावरूप नहीं है, जिसके अभाव औपाधिकत्व का उद्भावन करने से वह असिद्ध हो पाता । किञ्च स्वरूपासिद्धि सर्वप्रमाणसाधारण दोष है, अनुमिति का असाधारण नहीं । अतः उसके उद्भावन में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन–'जहाँ व्याप्तत्व और पक्षधर्मत्व से विशिष्ट प्रमितत्व का अभाव साक्षात् उद्भावित हो, वह असिद्ध है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो अव्याप्ति न होगी । खंडन—अव्यापक होने से यह भी लक्षण संभव नहीं । कारण जहाँ व्याप्ति के अभाव का उद्भावन होता है; वहाँ भले ही वस्तुतः व्याप्ति-प्रमिति का अभाव रहे, किन्तु कोई प्रयोजन न होने से उसका उपन्यास नहीं होता, क्योंकि व्याप्तिव्यतिरेक के दर्शन से ही अनुमान- साधनत्व का अभाव उद्भावित हो जाता है । तस्मात् वहाँ प्रमितत्वव्यतिरेक का उद्भावन न होने से अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—विशेषण (व्याप्ति) का अभाव भी वस्तुतः विशिष्टाभाव (व्याप्ति- प्रमितत्वाभाव) रूप ही है, अतः उक्त दोष नहीं होगा । खण्डन—यदि विशिष्ट विशेषण-विशेष्य से भिन्न है, तो विशिष्टाभाव भी विशेषणाभाव से भिन्न ही है । यदि