भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२५ विशेषणाभावत्वान्नान्या सा विशिष्टाभावतेति विशेष्याभावेऽपि तथात्वे पृथगेव विशिष्टाभावत्वार्थस्तयोरित्यननुगम एव । स्वार्थानुमित्यसिद्धव्यव्याप्तिश्चानुद्भा- वनादिति । अथ ब्रूषे—यत्र व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः साक्षाच्छक्योपन्यासस्तद- सिद्धम् , शक्योपन्यासत्वस्यानुपन्यस्तेऽपि सम्भवान्नास्त्यव्यापकतेति । नैतदपि युक्तम् ; तथाहि—शक्योपन्यासत्वं किं शक्यस्वरूपनिर्देशत्वमात्रम् , उत शक्यप्रमापणत्वम् ? आद्ये अनैकान्तिकादावपि व्याप्तिशून्यत्वं शक्यप्रतिज्ञं भवत्येव । द्वितीयेऽपि यदि साक्षादिति प्रत्यक्षेणेत्यर्थः, तदा प्रत्यक्षेण प्रमाप- णीयत्वं व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितिविरहस्य प्रत्यक्षप्रतियोगिकाभावप्रत्यक्षतावादिमते विरुद्धादावप्यस्तीत्यतिव्याप्तिः । अन्यमते न क्वचिदपीति सर्वाव्याप्तिः । अथ व्याप्तिपक्षधर्मताविरहस्यापि प्रत्यक्षप्रमापणीयता विवक्षिता, सा न वह भिन्न नहीं है, तो जैसे विशेषणाभाव विशिष्टाभाव है, वैसे ही विशेष्याभाव भी विशिष्टाभाव है, अतः अननुगम हो जायगा । किञ्च– स्वार्थानुमिति में व्याप्त्यादि- व्यतिरेक का उद्भावन न होने से अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘जिस स्थल में व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमितत्व का व्यतिरेक साक्षात् शक्यो- पन्यास हो, वह असिद्ध है। जहाँ उपन्यास नहीं होता, वहाँ भी वह संभाव्य तो है ही, अतः अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—‘शक्योपन्यास’ शब्द का क्या अर्थ है ? जिसके स्वरूप का निर्देश शक्य ( संभव ) हो यह अर्थ है, अथवा जिसका प्रमापण शक्य हो, यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में अनैकान्तिक आदि में भी व्याप्ति-व्यतिरेक का उपन्यास शक्य है, अतः अव्याप्ति तदवस्थ ही है । द्वितीय पक्ष में साक्षात् शब्द का ‘प्रत्यक्षतः’ ऐसा अर्थ करें, तो प्रत्यक्ष- धर्मिक अभाव को प्रत्यक्षरूप माननेवालों के मत में व्याप्ति-पक्षधर्मता-प्रमिति के विरह का प्रत्यक्ष से प्रमापणीयत्व विरुद्धादि में भी है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । जो प्रत्यक्षधर्मिक अभाव को प्रत्यक्ष नहीं मानते, अपितु षष्ठ प्रमाण मानते हैं, उनके मत में सर्वत्र असम्भव हो जायगा । अर्थात् असिद्ध में भी व्याप्त्यादि-प्रमिति के व्यतिरेक की प्रत्यक्षता नहीं है, कारण वह अनुपलब्धिगम्य है । समर्थन—‘जहाँ व्याप्ति तथा पक्षधर्मता का अभाव प्रत्यक्षज्ञान का विषय हो, वह असिद्ध है’ ऐसा कहेंगे। खंडन-– यह भी युक्त नहीं, कारण प्रमितिघटित उक्त लक्षण- वाक्य ( ‘व्याप्तत्व-पक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः’ ) में यह अर्थ बोधन करने की सामर्थ्य ही