भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

३२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम युक्ता; उक्तलक्षणवाक्यस्य व्याप्तिपक्षधर्मताविरहानभिधायित्वात् । तद्विरहेऽपि तात्पर्याभ्युपगमे प्रत्येकसमुदितलक्षणताविकल्पेन अव्यापकत्वापातात् । अतीन्द्रिय- पक्षादिविरहे च विषये तदभावादव्यापकत्वापत्तेः । एतेन यदि लिङ्गानपेक्षत्वं साक्षादर्थः, सोऽपि निरस्तः । अथोच्यते—यत्र व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः प्रतिपादनीयान्तरानपेक्ष- तया तत्प्रमापकस्य लिङ्गस्योपन्यासव्यतिरेकेण शक्योद्भावनः, तदसिद्धमिति । नैतदप्युपपन्नम् ; अतिव्यापकत्वात् । तथाहि—विरुद्धादौ शक्यते तावद्वि- नहीं है। मान भी लें कि उक्त वाक्य का यह भी अर्थ है, तो यदि उभयविरह का उद्भावन मिलितरूप में असिद्ध हो, तो जहाँ केवल व्याप्तिविरह का उद्भावन है, वहाँ अव्याप्ति हो जायगी। यदि एक-एक के अभाव का उद्भावन असिद्ध है, तो व्याप्तिविरह के उद्भावन को असिद्ध मानने पर पक्षधर्मताविरह के उद्भावनस्थल (आश्रयासिद्ध) में और पक्षधर्मता-व्यतिरेक के उद्भावन को असिद्ध मानने पर व्याप्तत्वासिद्ध में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—जहाँ पक्षादि-विरह अतीन्द्रिय है, वहाँ पक्षधर्मता और व्याप्ति का व्यतिरेक प्रत्यक्षप्रमा का विषय नहीं है; अतः वहाँ भी अव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् मीमांसक द्वारा प्रयुक्त ‘परमाणवः अनित्याः सर्वगतत्वात्’ यहाँ अतीन्द्रिय पक्षधर्मत्व का विरह है और ‘वन्ध्यासुतः चतुर्वेदाभिज्ञः ब्राह्मणीप्रसूतत्वात्’ यहाँ अतीन्द्रिय व्याप्तिविरह है । वे प्रत्यक्ष-प्रमा के विषय हो ही नहीं सकते, अतः वहाँ अव्याप्ति है । अतएव “साक्षात्' शब्द का लिङ्गानपेक्षत्व अर्थ है, अर्थात् जहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मता का विरह लिङ्ग की अपेक्षा न रखकर प्रमा का विषय हो, वह असिद्ध है” ऐसा जो कहते थे, वह भी खण्डित हो जाता है । कारण अतीन्द्रिय पक्षस्थल में आश्रयासिद्धि का लिंग से ही बोध होता है, अतः अतीन्द्रिय आश्रयासिद्धि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘जहाँ अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा न रखते हुए तथा प्रमितिजनक हेतु के उपन्यास के बिना ही व्याप्ति-पक्षधर्मता या तत्प्रमिति के व्यतिरेक का कथन हो सके, वह असिद्ध है' ऐसा कहेंगे । इस लक्षण में विरुद्ध में लिङ्ग का उपन्यास होने से अति- व्याप्ति नहीं है । इसी तरह अतीन्द्रिय पक्षस्थल में लिंग का उपन्यास तो है, किन्तु लिंग में व्याप्ति-प्रतिपादन की अपेक्षा न होने से वहाँ अव्याप्ति भी नहीं है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं है, कारण ‘शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्, शब्दोऽनित्यः