भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२७ पक्षवृत्तित्त्वेऽप्यङ्गभूततर्काभावात् सोपाधिकत्वावगन्तुम् । यदाह—'यत्रानुकूलस्तर्को नास्ति सोऽप्रयोजकः' इति । तस्मात्तेषामप्येवं लक्षणयोगित्वादसिद्धत्वप्रसङ्गः । न च तादृशतर्काविषयत्वमपि प्रतिपादनीयान्तरानपेक्षव्याप्तिपक्षधर्मताप्रमिति- विरहप्रमापकलिङ्गभूतमेवेति वाच्यम्; तथा सति विरुद्धत्वादिवत्तस्य हेत्वाभासा- न्तरत्वप्रसङ्गात् । अथोच्यते—तथोपन्यस्यमानं तदसिद्धं भवतु । साध्यविपरीतव्याप्तत्वादिना तु दूष्यमाणं विरुद्धाद्येव तत् । उपन्यासप्रकारभेदाच्च भेदव्यवस्था हेत्वाभासा- नाम् । न ह्यत्र गोत्वाश्वत्वादिवदत्यन्तासङ्कर इष्यते । किं नाम ? प्रमाणप्रमेय- भाववत् प्रकारासङ्करमात्रमिति । तदप्ययुक्ताभिधानम्; वक्तव्यं हि केन प्रकारेणासिद्धत्वं भवति ? न प्रमेयत्वात्' इत्यादि विरुद्ध-अनैकान्तिक स्थलों में विपक्षबाधक तर्काभाव से भी व्याप्ति के व्यतिरेक का अवगम होता है। यह बात उदयनाचार्यजी ने भी कही है कि जहाँ अनुकूल तर्क न हो, वह हेतु अप्रयोजक (व्याप्तिरहित) है । तस्मात् विरुद्धादि में उक्त लक्षण चला जाने से अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—विपक्ष-बाधक तर्क का अभाव भी इतर प्रतिपादनीय की अपेक्षा न होने से लिंगरूप से ही विरुद्धादि में व्याप्तिविरह का अनुमापक है, अतः अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—ऐसा मानने पर विरुद्धादि की तरह विपक्षबाधक तर्काभाव भी हेत्वाभास हो जायगा। समर्थन—कृतकत्व आदि हेतुओं में जिस समय विपक्षबाधक तर्क के अभाव से व्याप्यभाव का ज्ञान होता है, उस समय वह असिद्ध है और जब साध्याभावव्याप्तत्वा- दिरूप हेतु से व्याप्यभाव का ज्ञान होता है, तब वह विरुद्धादि है। इस तरह उपन्यास के प्रकार-भेद से ही हेत्वाभासों में भेद है। यह भेद गोत्व, अश्वत्व के तुल्य नहीं, किन्तु प्रमाण, प्रमेय के तुल्य है । अर्थात् जैसे एक ही वस्तु चक्षुरादि-प्रमिति की करण होने से प्रमाण और प्रमिति की विषय होने से प्रमेय है, वैसे ही प्रकार का यह असङ्करमात्र है । खंडन—यह कथन भी अयुक्त है, कारण प्रकार का असङ्कर होने पर भी यह अवश्य कहना होगा कि किस प्रकार से असिद्धत्व है ? उक्त लक्षणरूप प्रकार से असिद्धत्व नहीं कह सकते, कारण व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमिति के अभाव का शक्योद्भावनत्व-