खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तावदुक्तलक्षणेन, तथाशक्योद्भावनत्वस्य विरुद्धोचितप्रकारेणोपन्यस्यमानस्य सम्भवात् । सर्वथा निष्प्रकारकस्य असिद्धधर्मिणस्तदुद्भावनाशक्यत्वात् । न च तथाशक्योद्भावनत्वमप्युद्भाव्यते असिद्धेः, येन प्रकारभेद- व्यवस्थितिरनेन भवेत् । न च शक्योद्भावनपदस्थाने उद्भाव्यमानत्वमिति कृते निस्तारः; सोपाधित्वा- द्युद्भावने प्रमित्यभावोद्भावनं व्यर्थत्वान्न क्रियत इति तद्व्यापकत्वं प्रसज्येतेति प्रागेवोक्तत्वादिति । एतेन 'असिद्धः साध्यसमः' इति प्रत्युक्तम्; यथाकथञ्चित्साध्यसाम्यस्य सर्वसा- धारण्यात् । साम्यविशेषस्य चोक्तप्रकारपर्यवसानव्यतिरेकेण अन्यस्यासम्भवात् । रूप उक्त प्रकार विरुद्ध के उचित प्रकार ( लक्षण ) द्वारा कथित कृतकत्वादि में भी विद्यमान है। अर्थात् यदि असिद्ध का उक्त लक्षण करें, तो विरुद्धस्थल में असिद्धरूप हेत्वाभास से ही अनुमिति का प्रतिबन्ध होने से विरुद्ध की पृथक् हेत्वाभास में गणना व्यर्थ हो जायगी । समर्थन—'जहाँ साध्य के अभाव से व्याप्तत्वरूप विरुद्धत्व का उद्भावन न हो और व्याप्तिपक्षधर्मता-प्रमिति के व्यतिरेक शक्योद्भावनत्व का उद्भावन हो, वह असिद्ध है।' खण्डन—ऐसा कोई स्थल नहीं है, जहाँ विरुद्धादि प्रकार न हों, केवल असिद्ध ही हो । किञ्च—स्वार्थानुमिति में असिद्धस्थल में भी शक्योद्भावनत्व का उद्भावन नहीं होता । फिर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से भी व्यवस्था कैसे होगी ? समर्थन—'शक्योद्भावन' पद के स्थान में 'उद्भावन' मात्र देंगे अर्थात् 'व्याप्ति- पक्ष-धर्मताप्रमिति के व्यतिरेक का जहाँ उद्भावन हो, वह असिद्ध है, ऐसा कहेंगे । विरुद्धादि में यद्यपि उक्त व्यतिरेक है, तथापि उसका उद्भावन नहीं होता, अतः अति- व्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—व्याप्यत्वासिद्ध स्थल में केवल व्याप्ति के व्यतिरेक का ही उद्भावन होता है, प्रयोजन न होने से व्याप्तिप्रमिति के व्यतिरेक का उद्भावन नहीं होता । एवञ्च वहाँ अव्याप्ति ही जायगी, इत्यादि पीछे कह ही आये हैं । समर्थन—'साध्य से सम असिद्ध है।' खण्डन—यदि अस्तित्व, ज्ञेयत्व आदि धर्म से साम्य की विवक्षा करें, तो विरुद्धादि हेतु भी साध्यसम होने से असिद्ध हो जायेंगे । यदि साम्यविशेष की विवक्षा करें, अर्थात् जैसे 'साध्य, साध्य से व्याप्तत्वरूप से प्रमित नहीं है, एक होने से' तथा 'साध्य, पक्षधर्मता से प्रमित नहीं है, संदिग्ध होने से' इस तरह व्याप्ति-पक्षधर्मता से जो प्रमित न हो, वह साध्यसम है' ऐसी विवक्षा करें, तो उक्त प्रकार में ही पर्यवसान होगा और उन प्रकारों का खण्डन कर ही चुके हैं ।