भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

परिच्छेद ] [ विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ३२६ लक्ष्णान्तरेषु चोक्तदूषणप्रकारा यथासम्भवमिह योजनीया इत्यलं विस्तरेणेति । विरुद्ध-लक्षण-खण्डनम् अपिच—असिद्धलक्षणविशेषणेषु प्रमाणाव्यवच्छेदकव्यतिरिक्तेन यद्व्य- वच्छेद्यं तत् किं केनचिद्विरुद्धं केनचिदन्यदिति चेत्, विरुद्धमेव किमुच्यते ? तथाहि—साध्यविपरीतव्याप्तो विरुद्ध इत्याहुः । तन्न; साध्यव्यतिरेकेण हि व्याप्तिः कात्स्न्र्येन वा, अनौपाधिको वा स्वाभाविको व, सम्बन्ध इत्याद्युक्तिभिः सविशेषणः सहभाव एव निरुच्यते । तथा सति च साध्यव्यतिरेकेण सामानाधि- करण्यमेव विशेषणविशेषयुक्तं विरुद्धत्वमित्युक्तं स्यात् । यदा चैवं तदा साध्य- व्यतिरेकसामानाधिकरण्यमेव हेतोरगमकत्वे समर्थमिति तन्मात्रमुद्भाव्यम्, वृथा विशेषणप्रक्षेपः । तथा चानैकान्तिक एवायं स्यात् । असिद्ध के अन्य लक्षणों में भी उक्त दूषणों की या उक्त दूषणों के सदृश अन्य दूषणों की यथासंभव योजना करनी चाहिए, ग्रन्थ का विस्तार व्यर्थ है। विरुद्ध-लक्षण का खण्डन किञ्च—'व्याप्ति-पक्षधर्मता-तत्प्रमिति के व्यतिरेक का जहाँ लिङ्ग के उपन्यास के बिना कथन हो सके, वह असिद्ध है' इस लक्षण में प्रमित्यन्त पद प्रमाण (सद्धेतु) का व्यवच्छेदक है, किन्तु 'लिङ्ग के उपन्यास के बिना' तथा 'शक्योन्नयान' इन विशेषणों के व्यवच्छेद्य कौन हैं ? यदि कहें कि किसी का व्यवच्छेद्य विरुद्ध है और किसी का स्वार्थानुमितिस्थितीय असिद्ध का संग्रह फल है, तो विरुद्ध ही क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय ही है। अतः व्यवच्छेद्य के न होने से उक्त विशेषण व्यर्थ ही हैं । समर्थन—'साध्याभाव से व्याप्त हेतु विरुद्ध है ।' खण्डन—ऐसा नहीं कह सकते, कारण यहाँ साध्याभाव के साथ व्याप्ति पदार्थ विशेषणयुक्त सहभाव ही कहना होगा, क्योंकि सार्वत्रिक, अनौपाधिक या स्वाभाविक सम्बन्ध ही व्याप्ति है। एवञ्च साध्याभाव के साथ विशेषण (सार्वत्रिकत्वादि) से युक्त सहभाव (सामानाधिकरण्य) ही विरुद्ध हुआ। यदि ऐसा ही है, तो साध्याभाव के साथ सामानाधिकरण्य ही हेतु के व्याप्तिशून्यत्व में समर्थ प्रयोजक है, अतः उतना ही लक्षण कहना चाहिए, विशेषण का प्रक्षेप व्यर्थ है । तथाच यदि विशेषण न दें, तो विरुद्ध भी अनैकान्तिक ही हो जायगा । ४२