भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

परिच्छेद ] विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ३३१ विपक्षसम्बन्धमात्र नियततत्सम्बन्धाववश्योपन्यासाविति तत्सम्बन्धमात्रमेवास्तु । व्याप्तेस्तत्प्रमितेश्च व्यतिरेकस्य लिङ्गत्वानुद्भाव्यम्, कृतमितराभ्यामिति । लकारभेदप्रयोगे तैस्तैर्लकारैः कालविषयविशेषप्रतिपादनाद्विभक्तिभिर्लिङ्ग- सङ्ख्याज्ञापनवत् ‘पर्वतोऽग्निमानि’त्यादौ धर्म्यादिप्रतिपादनवच्च नेदं घटते, तत्र तेषामतात्पर्यविषयाणामपि पदप्रयोगे विशिष्टबोधने वा अन्यथासिद्धानां यथा बोधनं तथा यद्यत्रापि व्याप्तेरतात्पर्यविषयत्वं तदनैकान्तिकसाधारणादेव । अन्यथा उक्तदोषापरिहारादेवेति । अनैकान्तिकत्वञ्च ऽनुद्भावयता अनधिगच्छता वा विरुद्धमशक्योद्भावन- मशक्याधिगमञ्चेति तदुपजीवित्वान्न पृथक् दूषणम्, विशेष्यप्रतिपादनं विशेष्या- वगमञ्च विना विशिष्टप्रतिपादनस्य विशिष्टावगमस्य चाशक्यत्वात् । एवमन्यत्रापि विशेषणस्याप्रयोजकता विशेष्यस्य सामर्थ्ये स्वयमूहनीया । का कारण होने से विपक्ष में सम्बन्धमात्र का ही कथन करना चाहिए, सन्देह या निश्चय का उपन्यास व्यर्थ है । ‘शब्दो नित्योऽस्ति’ इस प्रतिज्ञा-वाक्य में कालसामान्य की विवक्षा होने से वर्तमान के प्रतिपादन के तुल्य तथा ‘वासः परिधेहि’ यहाँ कर्ममात्र की विवक्षा होने से लिङ्ग- संख्या के बोधन के तुल्य ‘पर्वतो वह्निमान्’ यहाँ विशिष्ट के बोध में तात्पर्य होने से धर्म्यादि के बोध के तुल्य सम्भव नहीं है । कारण जैसे उक्त स्थलों में तात्पर्य का विषय न होने से पदप्रयोग या विशिष्ट के बोध में अन्यथासिद्ध ( तात्पर्य का अविषय ) काल- विशेषादि का बोध होता है, वैसे ही यदि विरुद्धस्थल में व्याप्ति के बोध को तात्पर्य का विषय मानें, तो लक्षण अनैकान्तिक-साधारण हो जायगा । यदि व्याप्तिबोध को तात्पर्य का विषय न मानें, तो लक्षण में उक्त प्रकार से व्याप्ति का निवेश व्यर्थ हो जायगा । किञ्च—अनैकान्तिक के अज्ञान तथा अनुद्भावन के काल में विरुद्ध का ज्ञान तथा उद्भावन अशक्य है । कारण साध्याभाव के साथ सम्बन्धरूप विशेष्य के ज्ञान और प्रतिपादन के बिना सार्वत्रिकसम्बन्धरूप विशिष्ट का अवगम और प्रतिपादन अशक्य है, अतः विशेष्य-ज्ञान उपजीव्य है । इसी प्रकार अन्यत्र भी विशेष्य की सामर्थ्य होने पर विशेषण का वैयर्थ्य जानना चाहिये । देखिए—‘इदं साधारणं साधारणानैकान्तिकत्वात्’ यहाँ ‘साधारण’ विशेषण तथा ‘इदमसाधकं सपक्षकविपक्षगतत्वात्’ यहाँ सपक्ष विशेषण व्यर्थ है । इसी प्रकार ‘शब्दो

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