भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

३६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

तद्यथा—‘इदमसाधकं साधारणानैकान्तिकत्वादित्यत्र साधारणोति विशेषणे, सपक्षविपक्षगतत्वादित्यत्र सपक्षगतत्वेऽप्युद्भाव्यमाने; एवमसाधारणेऽपीति । ‘इदमसाधकं जातित्वादिति जातित्वविवेचने स्वव्याघातकमुत्तरं जातिरिति स्वव्या- घातकत्वस्यैव, ‘सर्वमसत् ज्ञेयत्वादित्याद्यजातिजातिसाधारणस्य दूषणसमर्थत्वे- नोत्तरत्वाभिधान इति । किञ्च—साध्यविपरीतेति साध्याभावेत्यर्थे यदा अभावात्मकमेव साध्यः क्वचिद्भवति, तत्र तद्विपरीतस्य भावत्वात्तदव्यापकत्वं लक्षणस्य । न च विपरीतशब्दस्य विरोधिमात्रार्थत्वे भावाभावोभयव्याप्तिरिति वाच्यम् । सहानवस्थानं हि भावाभावयोर्विरोधोऽभ्युपेयते । अनवस्थानञ्च संसर्गनिषेधः । स च भावाभावयोरन्योन्यानवस्थानमेव, परस्परप्रतिषेधरूपत्वात्तयोः । तथा च सति भावाभावयोः स्वरूपस्यानुपसङ्ग्रहे प्रत्येकमव्याप्तिः मिलितस्यासम्भव एवेति । वक्ष्यामश्च भावाभावयोर्विरोधनिरुक्तिनिराकरणमुपरिष्टादिति । नित्यः शब्दत्वात्' इस असाधारण स्थल में 'शब्दत्वम्, असाधकम्, असाधारणानैकान्तिका त्वात्' यहाँ 'असाधारण' विशेषण तथा 'शब्दत्वम्, असाधकम्, सपक्षविपक्षव्यावृत्तत्वात्' यहाँ 'विपक्ष'-विशेषण व्यर्थ जानना चाहिए । 'इदमसाधकं जातित्वात्' यहाँ 'स्वव्याघातक उत्तर जाति है' यह जातिशब्दार्थ मानने पर 'स्वव्याघातकत्व' ही 'सर्वम्, असत्, ज्ञेयत्वात्' इस अजातिस्थल के तुल्य दूषण में समर्थ है, अतः 'उत्तर' इस विशेष्य-अंश का अभिधान व्यर्थ है । किञ्च—लक्षण में 'साध्यविपरीत' शब्द का यदि 'साध्याभाव' अर्थ करें, तो जहाँ अभाव ही साध्य है, वहाँ साध्यविपरीत भाव ही होता है, अभाव नहीं । अतः वहाँ लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—लक्षणघटक 'विपरीत' शब्द का विरोध अर्थ है । अतः उससे भाव और अभाव दोनों का ग्रहण होने से अव्याप्ति नहीं है । खण्डन — सह-अनवस्थान ही भाव और अभाव का विरोध है । अनवस्थान संसर्ग का निषेध है और वह भाव-अभाव के अन्योन्य का अनवस्थानरूप है । कारण भाव का प्रतिषेधरूप अभाव है और अभाव का प्रतिषेधरूप भाव है । ऐसी स्थिति में 'विरोध' शब्द से दोनों के स्वरूप का संग्रह नहीं होगा । अतः लक्षण में अभाव का उपादान होने पर जहाँ अभावरूप साध्य 'विपरीत है, वहां अव्याप्ति हो जायगी । लक्षण में भाव, अभाव दोनों का 'विपरीत' शब्द से ग्रहण करें, तो सर्वत्र असम्भव हो जायगा । साथ ही भाव तथा अभाव के विरोध की निरुक्ति का खण्डन भी आगे किया जायगा ।

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक) · पृष्ठ 349, कुल 610 में से · BharatKosha