खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३३ सव्यभिचारलक्षणखण्डनम् किञ्च—व्याप्तिपदेन लक्षणप्रविष्टेन किं व्यवच्छेद्यम् । अनैकान्तिकमिति चेत्, किं तदनैकान्तिकम् ? तथाहि—'अनैकान्तिकः सव्यभिचार इत्यलक्षणम् । सव्यभिचारत्वं हि यदि विपक्षवर्तित्वं, तदानीं विरुद्धेऽपि प्रसङ्गः, असाधारणानेका- न्तिकान्याप्तिश्च । अथ सपक्षविपक्षगताभावता, तदा साधारणोदाहरणाव्यापकत्वम् । अथोच्यते—सव्यभिचारत्वं सपक्षविपक्षसाधारणता अभिप्रेता । सा चान्वयेन साधारणस्य व्यतिरेकेणासाधारणस्यानैकान्तिकस्य सङ्ग्राहिका । सपक्षविपक्षसाधा- सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन किञ्च—विरुद्ध के लक्षण में प्रविष्ट व्याप्ति का व्यवच्छेद्य क्या है ? यदि अनैका- न्तिक है, तो अनैकान्तिक क्या वस्तु है । अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्व- चनीय है । एवञ्च व्यावर्थ न होने से लक्षण में व्याप्ति का निवेश व्यर्थ हो जायगा । निर्वचन—अनैकान्तिक ही उसका व्यवच्छेद्य होगा । खण्डन—यह ठीक नहीं, क्योंकि अनैकान्तिक सिद्ध ही नहीं है । लक्षण से उसकी सिद्धि हो सकती है, किन्तु उसका कोई लक्षण ही नहीं हैं । यदि कहें कि 'अनैकान्तिक सव्यभिचार है', तो यह लक्षण युक्त नहीं है । कारण सव्यभिचार क्या है, क्या वह विपक्षवृत्तित्व है, सपक्ष-विपक्ष- वृत्तित्व है या सपक्ष-विपक्षसाधारणता है ? यदि विपक्षवृत्तित्व को सव्यभिचार कहें, तो ‘शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात्' इस विरुद्ध में अतिव्याप्ति तथा 'शब्दोऽनित्यः आकाशविशेष- गुणत्वात्' इस असाधारण में अव्याप्ति हो जायगा । यदि सपक्ष-विपक्ष में जिसका अभाव हो, वह सव्यभिचार है, तो 'शब्दोऽनित्यः प्रमेयत्वात् इस साधारण अनैकान्तिक में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—सपक्ष-विपक्ष में साधारणता सव्यभिचारत्व है । वह अन्वय से साधारण का और व्यतिरेक से असाधारण का संग्राहक है । यदि केवल अन्वय से सपक्ष-विपक्ष- साधारणता कहें, तो असाधारण में और यदि केवल व्यतिरेक से कहें, तो साधारण में और यदि अन्वय-व्यतिरेक दोनों से सपक्ष-विपक्षसाधारणता कहें, तो दोनों में अव्याप्ति १. 'एकस्मिन्नेव साध्ये नियतः एकान्तः, न एकान्तः अनैकान्तः । व्यभिचारश्च सम्बन्धा- नियमस्तेन सहितः सव्यभिचारः । एवञ्च अनियतसाध्यसम्बन्धोऽनैकान्त इति ।' अर्थात् एक ही साध्य में जो नियत हो, वह एकान्त है और जो एकान्त नहीं, वह अनैकान्त है । इसी तरह व्यभिचार का अर्थ है ( व्याप्ति )-सम्बन्धका अनियम, उसके सहित सव्यभिचार है । अर्थात् जिस हेतु का साध्य के साथ नियत ( व्याप्ति )-सम्बन्ध न हो, वह सव्यभिचार हेत्वाभास है ।