भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 351

३५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम रणता अन्वयेन व्यतिरेकेण वेति विशेषणवत्तया न विवक्षिता, अतः साधारणा- साधारणानेकान्तिकयोरुभयोरपि सङ्ग्रहः । 'विवादाध्यासितं क्षणिकं सत्त्वादि'त्यादेरनुपसंहार्यस्यापि सपक्षाविपक्षगतत्वा- भावेन साम्यमिति । विचार्यमेतद् व्याख्यानम् , परमस्तु तावदापातः ; तथापि व्यतिरेकेण सपक्षाविपक्षसाधारणतायाः सपक्षाव्यापके सद्धेतौ धूमविशेषादौ गतत्वेनातिव्यापक- त्वात् । यदि त्वस्य दोषस्य परिहाराय सर्वविपक्षसपक्षसाधारणमनैकान्तिकमिति ब्रूषे, तदा व्यतिरेकमात्रेण सर्वसपक्षाविपक्षसाधारणता धूमानुमानादिगामिनी न भवतु नाम । अन्वयेन तु सर्वसपक्षाविपक्षसाधारणता विपक्षसपक्षैकदेशगामिनं साधारणानेकान्तिकं 'शब्दो न नित्यः प्रत्यक्षग्राह्यत्वादि'त्यादिकं न सङ्गृह्णाती- त्यव्याप्तिरित्येकं सन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवते । हो जायगी, अतः विशेष की विवक्षा नहीं है । किन्तु जहाँ अन्वय से समन्वय की सम्भावना हो, वहाँ अन्वय से और जहाँ व्यतिरेक से लक्षण के समन्वय की सम्भावना हो, वहाँ व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारणता का ग्रहण करना चाहिए । 'विवाद-विषय सब वस्तुएँ क्षणिक हैं, ज्ञेय होने से' इस अनुपसंहारी का भी, सपक्ष-विपक्ष न होने से ही, व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारणता बन जाने के कारण संग्रह हो जाता है । खंडन—यह व्याख्यान विचारणीय है, अर्थात् विचारणीय होने से रमणीय अवश्य है, किन्तु आपाततः ही । फिर भी व्यतिरेकतः यत्किञ्चित् सपक्ष-विपक्षसाधारणता सपक्षाव्यापक ( तप्त अयोगोलक में अवृत्ति ) धूमरूप सद्धेतु में भी है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि इस दोष के वारणार्थ 'सर्वसपक्ष-विपक्ष-साधारणता' को अनैकान्तिक कहें, तो भले ही व्यतिरेक से सब सपक्षविपक्ष-साधारणता धूमरूप सद्धेतु में न होने से वहाँ अतिव्याप्ति न हो, फिर भी अन्वय से सर्व-सपक्ष- विपक्षसाधारणता विपक्ष ( आत्मा ) और सपक्ष ( घटादि ) के एकदेश में स्थित 'शब्दोऽनित्यः प्रत्यक्षग्राह्यत्वात्' इस साधारण अनैकान्तिक में अव्याप्ति हो जायगी । कारण सब सपक्षों में गुरुत्व गुण और सब विपक्षों में आकाश भी आते हैं, उनमें अन्वय से प्रत्यक्षत्व नहीं है । इस प्रकार आप एक दोष का परिहार करना चाहते हैं, तो अन्य दोष टपक पड़ता है ।