भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 610 में से

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पृष्ठ 353

परिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३५ अपि चान्वयव्यतिरेकाभ्यां सर्वसपक्षविपक्षगतत्वाद् धूमानुमानादौ स एव प्रसङ्गः, विशेषरूपेण तयोरविवक्षितत्वात् । किञ्च—सर्वसपक्षविपक्षसाधारणमनैकान्तिकमिति वाक्ये यदि सर्वेति विपक्षस्यापि विशेषणं तदा विपक्षैकदेशवृत्तेः सपक्षव्यापिनः साधारणानैकान्ति- कस्य 'त्रसरेणुः कार्यावयवको महत्त्वात् घटवद्'त्यादेरव्यापकं लक्षणमिदम् । अथ सर्वेति न विपक्षस्य विशेषणं तदा व्यतिरेकमादाय विपक्षसर्वसपक्षसाधारणमनै- कान्तिकमिति एतद्विपक्षैकदेशमात्रवृत्तौ विरुद्धे 'क्षितिर्नित्या सावयवत्वादि'त्यादौ गतत्वादतिव्यापकमिति । का चेयं वाचो युक्तिः सपक्षविपक्षसाधारणमनैकान्तिकमित्युक्ते सर्वं सङ्गृह्यते अन्वयेन व्यतिरेकेण चेति । कथमनुपसंहार्यस्यासत्सपक्षविपक्षस्य सपक्षे विपक्षे वा अन्वयेन व्यतिरेकेण वा साधारण्यं स्यात्, तयोरेवाभावात् । यदि च सपक्षे च विपक्षे च साधारणत्वमुभयत्र स्वरूपानुगमो विवक्षितः, किञ्च—अन्वय-व्यतिरेक से सभी सपक्षों और व्यतिरेक से सभी विपक्षों में साधारण (व्यापक) होने से धूमादि सद्धेतु में अतिव्याप्ति भी हो जायगी, कारण 'केवल अन्वय या केवल व्यतिरेक से ही जो सपक्ष-विपक्षसाधारण हो', ऐसी विशेष की विवक्षा तो है ही नहीं । किञ्च—'सर्वसपक्ष-विपक्षसाधारणमनैकान्तिकम्' इस वाक्य में 'सर्व' को यदि विपक्ष का भी विशेषण मानें, तो परमाणुरूप में विपक्ष न रहने से विपक्ष का एकदेश दिग् आदि में वृत्ति तथा सर्वसपक्षवृत्ति 'त्रसरेणुः कार्यावयवकः महत्त्वात् पटवत्' इस साधारण अनैकान्तिक में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि सर्व को विपक्ष का विशेषण न मानें, तो 'विपक्ष तथा सब सपक्षों में साधारण अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण हुआ । उसकी 'क्षितिर्नित्या सावयवत्वात्' इस विरुद्ध में अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण व्यतिरेक से बुद्ध्यादि विपक्ष और परमाणु आदि सब सपक्षों में सावयवत्व-हेतु साधारण है । किञ्च—'सपक्ष-विपक्षसाधारणरूप अनैकान्तिक अन्वय-व्यतिरेक से सबका संग्राहक है' यह वचन-भंगी सर्वथा निन्य है, कारण सपक्ष-विपक्षरहित अनुपसंहारी का अन्वय या व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारण्य संभव ही कैसे है, क्योंकि उसे पक्ष या विपक्ष कुछ भी नहीं होता । यदि सत्त्व का सपक्ष-विपक्ष में साधारण्य कहें, तो असाधारण अनैकान्तिक का असंग्रह हो जायगा; कारण असाधारण हेतु का सत्त्व सपक्ष-विपक्ष में नहीं होता । यदि

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