भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

तदानीमसाधारणानैकान्तिकाव्याप्तिः । अथोभयस्मिंस्तस्मिन्नसत्त्वं तद्विवक्षितम्, तदा सर्वाव्याप्तिः, तदसत्त्वस्यातद्धर्मत्वात् । अथ तदुभयवर्त्यभावप्रतियोगित्वं तदुभयसम्बन्धस्य योऽभावस्तदाश्रयत्वं वाऽभिप्रेतम्, तदाऽपि साधारणो- दाहरणाव्याप्तिः । अथ मन्यसे तदुभयसाधारण्यं नाम एकस्मिन् यादृश्यं हेतोः सत्त्वमसत्त्वं वा तादृग्यमपरस्मिन्नपि यत्तदुच्यते, तथा सति नाव्यापकतादोष इति । मैवम्; मुख्य- स्तावद्वचनार्थो नोपपद्यते—हेतोरेकरूपस्य सपक्षविपक्षावाश्रय इति । किं नाम ? ऐकरूप्यवतो हेतोस्तौ आश्रयाविति स्यात् । तदा चासाधारणाव्याप्तिः, तत्र सपक्षे विपक्षे च हेतोरसत्त्वेन तदाश्रयत्वासम्भवात् । तस्मात् सपक्षे विपक्षे च साधारणत्वं हेतोरनैकान्तिकत्वमित्यनुपपन्नमेव । असत्त्वपक्षे हेतोस्तदाश्रयकत्वानुपपत्त्या सपक्षे विपक्षे चेति सप्तमीनिर्देशस्या- सङ्गतत्वात् । तदभावापेक्षया चाश्रयत्वस्योपपत्तौ हेतोस्तदाश्रयत्वे किमायाताम् । असत्त्व का सपक्ष-विपक्ष में साधारण्य कहें, तो असम्भव हो जायगा; कारण हेतुवृत्ति असत्त्व हेतु में नहीं रहता, क्योंकि अंशतः आत्माश्रय हो जायगा। यदि 'सपक्ष-विपक्ष में स्थित जो अभाव, तत्प्रतियोगित्व' अथवा 'सपक्ष-विपक्षसम्बन्ध का जो अभाव, तदाश्र- यत्व' को साधारण कहें, तो साधारण अनैकान्तिक में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—एक ( सपक्ष या विपक्ष ) में हेतु का जो रूप ( सत्त्व या असत्त्व ) हो, उसी रूप का अन्य ( विपक्ष या सपक्ष ) में होना ही सपक्ष-विपक्ष-साधारण्य है अतः अव्याप्ति दोष नहीं है । खण्डन—'हेतु के ऐकरूप्य ( सत्त्व या असत्त्व ) के सपक्ष और विपक्ष आश्रय हैं' यह मुख्य अर्थ तो सम्भव नहीं । कारण हेतु के सत्त्व का आश्रय हेतु ही है, क्योंकि वह उसीका धर्म है, सपक्षादि नहीं । किन्तु लक्षणा द्वारा 'ऐकरूप्य से युक्त हेतु के सपक्ष-विपक्ष आश्रय हों' यही अर्थ करना होगा । ऐसा अर्थ मानने पर असाधारण में अव्याप्ति हो जायगी; कारण असाधारण हेतु के पक्षमात्रवृत्ति होने के कारण उसका सपक्ष या विपक्ष में असत्त्व होने से उसमें सपक्ष-विपक्षाश्रयत्व नहीं है । तस्मात् हेतु का सपक्ष-विपक्ष में साधारणत्व अनैकान्तिकत्व है, यह अनुपपन्न ही है । किञ्च—असाधारण स्थल में हेतु का सत्त्व सपक्षादि में नहीं है, अतः 'हेतु की अपेक्षा सपक्ष में, विपक्ष में' यह सप्तमी-निर्देश अनुपपन्न है। यद्यपि हेत्वभाव की अपेक्षा सप्तमी-निर्देश उपपन्न है, परन्तु उससे हेतु में लक्षण का समन्वय कैसे होगा ?