भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355

[परिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३७

आयातु वा किञ्चित् ; तथापि साधारणोदाहरणेषु हेत्वभावापेक्षया सपक्षविप- क्षयोर्नाऽऽश्रयता सप्तम्यर्थः । किन्तु हेत्वपेक्षयैवेति एकार्थापर्यवसायित्वे वाक्यस्य लक्षणाव्यापकतापत्तिरेव । किञ्च सपक्षविपक्षासाधारणत्वं यदि सामान्यतो लक्षणं साधारणासाधारणा- नैकान्तिकभेदद्वयसङ्ग्रहार्थमुच्यते, तदा सपक्षविपक्षद्वयान्यत्वादिभिर्हेतोः साधा- रण्यमस्त्यन्यत्रापोत्यतिव्याप्तिः । अथातिव्याप्तिपरिजिहीर्षया अन्वयव्यतिरेकाभ्यां सपक्षविपक्षसाधारणमनै- कान्तिकमित्युच्यते, तदा अन्वयव्यतिरेकयोः प्रत्येकमिलितविकल्पानुपपत्त्या अव्यापकत्वापातः । स्यादेतत् —स्वस्वभावविरोधाश्रयाश्रितसपक्षविपक्षत्वं सपक्षविपक्षसाधारण्यं विवक्षितम्, एवं नाव्याप्त्यतिव्याप्ती इति । तदप्यसत् ; तथाहि—अस्तु तावत्सर्व-

यदि ऐसा कहें कि सपक्ष-विपक्षनिष्ठ अभाव का प्रतियोगित्व हेतु में होने से समन्वय हो जायगा, तो भी साधारण के उदाहरण में 'हेत्वभाव की अपेक्षा आश्रयत्व' सप्तम्यर्थ नहीं है, किन्तु 'हेतु की अपेक्षा आश्रयत्व' ही सप्तम्यर्थ है । अतः वाक्य के अनेकार्थक होने से लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि साधारण, असाधारण दोनों अनैकान्तिकों के संग्रहार्थ सामान्यतः सपक्ष-विपक्ष-साधारणत्वमात्र लक्षण करें; तो अन्यत्र विरुद्धादि में भी हेतु का [ अन्यत्व, सत्त्व, ज्ञेयत्व आदि से ] सपक्ष-विपक्ष-साधारण्य ( सादृश्य ) है । अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि अतिव्याप्ति के परिहार की इच्छा से यह कहें कि 'अन्वय-व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारण्य अनैकान्तिक है', तो यदि केवल अन्वय से साधारण्य की विवक्षा करें, तो असाधारण में और केवल व्यतिरेक से विवक्षा करें, तो साधारण में और दोनों से विवक्षा करें, तो उभयत्र अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस हेतु का सपक्ष-विपक्ष, हेतु और हेत्वभाव के विरोध के आश्रय का आश्रय हो, तत्त्व सपक्ष-विपक्ष-साधारण्य है ।' अतः अव्याप्ति तथा अतिव्याप्ति नहीं हैं। खण्डन —यह भी युक्त नहीं, कारण सपक्ष-विपक्ष में 'सर्व' विशेषण देंगे या नहीं ? प्रथम पक्ष में 'शब्दो न नित्यः प्रत्यक्षप्राप्तत्वात्' इस साधारण में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में तथा प्रथम में भी पक्ष, सपक्ष के धूम-धूमाभाव के विरोध के ४३