खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्यादेतत्—सपक्ष एव विपक्ष एव वर्तते न यः, सोऽनैकान्तिक इति लक्षणा- मस्तु। तेन साधारणासाधारणानैकान्तिकोदाहरणव्याप्तिर्भवतीति । एतदप्यलक्षणम्; सद्धेतौ धूमादावपि गतत्वात् । न ह्यसौ विपक्ष एव वर्तते, सर्वथा तत्रावृत्तेः । नापि सपक्ष एव, पक्षेऽपि वर्तमानत्वात् । अथ पक्षवृत्तिरिति विशेषयसि; तथापि सद्धेतोरपरित्यागः , पक्षवृत्तित्वादेव सपक्ष एव वृत्तेरभावात् , असिद्धानैकान्तिकसङ्कराव्याप्तिश्च । अथ पक्षव्यतिरिक्त इति विशेषणं प्रक्षिपसि, तदानीमप्रसक्तव्यावर्तनमनुप- पन्नम् । न हि पक्षाव्यतिरिक्तः सपक्षो विपक्षो वा संभवतीति सपक्षस्य विपक्षस्य च कुतश्चिद्व्यावर्तकं विशेषणमेवेदं तयोः कथं घटेत । अथ पक्षव्यतिरिक्ते वर्तमान इति विशेषयसि, तदानीमसाधारणाव्याप्तिः, नासौ पक्षव्यतिरिक्ते वर्तमानः । समर्थन—'जो न केवल सपक्ष में और न केवल विपक्ष में ही रहे, वह अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण करेंगे । इससे साधारण और असाधारण दोनों का संग्रह हो जायगा । खण्डन—ऐसा भी लक्षण नहीं कर सकते, क्योंकि सद्धेतु धूम में अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण धूम विपक्ष में सर्वथा न रहने से 'विपक्ष में ही नहीं है' और पक्ष में भी होने से 'सपक्ष में ही नहीं है' । समर्थन—'पक्षवृत्ति होता हुआ जो हेतु न तो सपक्षमात्र में और न विपक्ष- मात्र में ही न रहता हो, वह अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन -- फिर भी सद्धेतु में ही अतिव्याप्ति है ही, कारण वह पक्षवृत्ति होने से सपक्षमात्र में वृत्ति नहीं है । किञ्च—'शब्दोऽनित्यश्चाक्षुषत्वात्' इस असिद्ध और नित्य अभाव में वृत्ति होने से अनैकान्तिक के सङ्करस्थल में अव्याप्ति हो जायगी, कारण हेतु पक्षवृत्ति नहीं है । समर्थन—'पक्षव्यतिरिक्त सपक्षमात्र में और विपक्षमात्र में ही जो न रहता हो, वह अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—'पक्षव्यतिरिक्त' विशेषण व्यर्थ है, कारण यदि कहीं सपक्ष और विपक्ष पक्षरूप होते, तो उनकी व्यावृत्ति के लिए यह विशेषण सार्थक होता । पक्षाव्यतिरिक्त सपक्ष-विपक्ष हैं नहीं, अतः पक्षव्यतिरिक्त- विशेषण व्यर्थ है । समर्थन—'पक्षव्यतिरिक्त' में वर्तमान जो हेतु सपक्ष में ही और विपक्ष में ही न रहता हो, वह अनैकान्तिक है' ऐसा कहेंगे । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर असाधारण में अव्याप्ति हो जायगी, कारण वह पक्षव्यतिरिक्त में वर्तमान नहीं है ।