खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 359, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सव्यभिचार लक्षण का खण्डन ३४१ अथ पक्षव्यतिरेकेणेति विशेषणमुपादत्से, तदाऽपि पक्षव्यतिरेकस्य पक्षविरह- रूपस्योपलक्षणत्वं हेतुत्वं वा द्वयमपि पक्षमात्रवृत्तावसाधारणानैकान्तिके न सम्भवति, पक्षविरहस्य तत्रासम्भवादेव । निषेध्यविशेषणत्वे त्वस्य सद्धेतौ गमनं स्यात् । एतेन पक्षं विना पक्षमन्तरेणेत्याद्यक्षरैर्विशेषाभिधानमपास्तम् । अथ यदि पक्षव्यतिरिक्ते वर्तते तदा सपक्ष एव विपक्ष एव न वर्तते यः सोऽनैकान्तिकः, तथा सत्यसाधारणस्यापि व्याप्तिः, सद्धेतौ चाप्रसक्तिरिति मन्यसे; तदा भ्रान्तोऽसितराम् । एवं सति नोभयस्यापि सङ्ग्रहः । असाधारणे तावद्यदि पक्षव्यतिरिक्ते वर्तत इत्येतन्न सम्भवति, तस्य पक्षमात्र- वृत्तेः कदाचिदपि पक्षव्यतिरिक्तवृत्तिसम्भावनानुपपत्तेः । समर्थन—'पक्षव्यतिरेकेण सपक्ष में ही विपक्ष में ही जो न रहता हो, वह अनैका- न्तिक है।' पक्षव्यतिरेकेण' यहाँ 'पक्षव्यतिरेक' का अर्थ पक्ष का अभाव है और तृती- यार्थ हेतु या उपलक्षण दोनों होता है । उक्त उपलक्षणत्व या हेतुत्व दोनों पक्षमात्रवृत्ति असाधारण में नहीं हो सकते; कारण असाधारण हेतु में पक्षविरहत्व ही नहीं है, फिर वह उपलक्षण या हेतु होगा कैसे ? एवञ्च वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि 'पक्षव्यतिरेकेण' यहाँ तृतीयार्थ उपलक्षणत्व या हेतुत्व का व्यावर्त्य ( निषेद्ध्य ) सद्धेतु और विरुद्ध में अन्वय है, तो सद्धेतु में पूर्वोक्त प्रकार से अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् धूमादि सत्-हेतु पक्षव्यतिरेकेण विद्यमान भी सपक्षमात्र वृत्ति नहीं, कारण पक्ष में रहता है, अतः वहाँ अव्याप्ति है । चूँकि 'पक्षव्यतिरेकेण' को संश्राद्य अनैकान्तिक का विशेषण मानें, तो असाधारण में अव्याप्ति होती है और निषेध्य का विशेषण मानें, तो सद्धेतु में अतिव्याप्ति होती है, इसलिए जो लोग 'पक्षव्यतिरेकेण' के स्थान पर 'पक्षं विना' या 'पक्षमन्तरेण' आदि शब्दान्तरों की योजनाकर लक्षण करते हैं, वे लक्षण भी खण्डित हो जाते हैं । कारण उसमें भी ये दोष बने ही रहेंगे । समर्थन—'यदि पक्षव्यतिरिक्त में रहता हो, तो जो न सपक्ष में ही और न विपक्ष में ही रहे, वह अनैकान्तिक है' ऐसा कहने पर असाधारण का संग्रह और सद्धेतु का वारण दोनों हो जाते हैं । खंडन—यदि आप ऐसा मानते हैं, तो अतिभ्रम में हैं, कारण इससे साधारण, असाधारण दोनों का भी संग्रह नहीं हुआ । देखिये—असाधारण में 'यदि पक्षव्यतिरिक्त में रहता हो' यह अंश समन्वित