भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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३४२ सानुवादं खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम साधारणोऽपि निश्चितसपक्षविपक्षवृत्तौ यद्यर्थं न पश्यामो यदि पक्षव्यतिरिक्ते वर्तत इति । न हि निश्चितवृक्षभावायां शिंशपायां प्रयुज्यते 'यदि शिंशपावृक्षः स्यादि'ति । तत्कस्य हेतोः ? संशयोपस्थापितात् कोटिद्वयादेकस्यां कोटौ तदाश्रये किञ्चिद्धर्मोपदर्शनार्थमारोप्यमाणायां यदीति प्रयुज्यते, न तु निश्चित एव वस्तुनि । तस्मादसाधारणानैकान्तिकसङ्ग्रहाय यदीत्याद्युपात्तं तन्न साधारणमपि समग्रहीत् । अथ विपक्ष एव सपक्ष एव न वर्तते यो हेत्वाभासः सोऽनैकान्तिक इति मन्यसे । तदप्यनुपपन्नम्; अनैकान्तिकत्वमनिश्चित्याग्रत एव हेत्वाभासत्वावधारणे तत एव हेतोरसाधकत्वं सिद्धमिति कृतं तदुपजीविनाऽनैकान्तिकत्वोपन्यासेन । अथाग्रे हेत्वाभासत्वं नावधार्यते, तदा लक्षणस्य दुरवधारणत्वम्, विशेषणस्य हेत्वाभासत्वस्यानवधारणात् । नहीं होता, क्योंकि वह पक्षमात्रवृत्ति है । उसमें कदापि पक्षव्यतिरिक्तवृत्तित्व की सम्भावना ही नहीं है । साधारण में भी सपक्षवृत्तित्व निश्चित है, अतः 'यदि पक्षव्यतिरिक्त में रहता हो' इस 'यदि' शब्द का अर्थ हम नहीं देखते । कारण जिसमें वृत्तित्व निश्चित हो, उस शिंशपा में 'शिंशपा यदि वृक्षः स्यात्' ऐसा वाक्य-प्रयोग नहीं होता । निश्चय होने पर यदि-घटित वाक्य न बोलने का कारण यही है कि संशय से उपस्थापित कोटिद्वय के मध्य एक कोटि के विषय में किसी धर्म के आरोप के लिए ही 'यदि' शब्द का प्रयोग होता है । निश्चित वस्तु में 'यदि' का प्रयोग नहीं होता । तस्मात् असाधारण अनैकान्तिक के संग्रहार्थ प्रयुक्त 'यदि' शब्द साधारण का भी संग्रह न कर सका । समर्थन—'जो हेत्वाभास सपक्षमात्र में और विपक्षमात्र में न रहता हो, वह अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण करेंगे । तथाच सद्हेतु में निश्चितसाध्यवन्मात्र-वृत्तित्वा- भाव होने पर भी अतिव्याप्ति नहीं है, कारण उसमें हेत्वाभासत्व नहीं है । खंडन— अनैकान्तिकत्व के निश्चय के बिना यदि प्रथम ही हेत्वाभासत्व का ज्ञान हो जाता है, तो उसीसे हेतु में असाधकता सिद्ध हो जायगी । एवञ्च हेत्वाभासत्व-घटित अनैकान्तिक का यह लक्षण व्यर्थ है । यदि प्रथम हेत्वाभासत्व अनिश्चित है, तो विशेषण के अनिश्चय से लक्षण का ज्ञान ही नहीं होगा ।