भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 362

३४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम भेदाभेदात्तद्देवातदपि चेन्न । अतदपीति प्रसङ्गतादवस्थ्यात् । ततोऽत्यन्तान्यत्वं लक्षणमिति चेन्न । असिद्ध्यादिसङ्कीर्णानैकान्तिकोदाहरणा- व्यापनात् । स्वरूपाणाञ्च आनन्त्येन तत्प्रतियोगिकान्यत्वावधारणाशक्यतया, तेषामानन्त्यात् । तन्मध्यपतितकतिपयान्यत्वे चान्यत्र कतिपये प्रसङ्गतादवस्थ्यात् । उपलक्षणत्वे चोभयव्यतिरेकस्य अन्यत्वप्रतियोगिकोट्यप्रवेशेन तत्सङ्गृ- हीतव्यतिरेकपक्षापातात् । एवञ्च अदृष्टबाणादिना गोत्वादेवम्भूताद् बाणादिविषाणित्वानुमानौ- चित्यापातात् । समर्थन—यद्यपि विशिष्ट से शुद्ध का भेद है, कारण केवल विशेष्य में विशिष्ट की प्रतीति नहीं होती, तथापि अभेद भी है । कारण वस्तुतः विशेष्य ही विशिष्ट भी है । अतः व्यतिरेकद्वय से उपलक्षित जो शुद्ध, उससे अभेद होने से विशिष्ट भी तदन्य नहीं है । खण्डन—भेद भी तो है, अतः उपलक्षित विशेष्य से विशिष्ट के अन्य होने से उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो ही जायगी । समर्थन—उपलक्षित से अत्यन्त भेद लक्षण में घटित है और उपलक्षित से अत्यन्त भेद विशिष्ट में नहीं है । खण्डन—'शब्दोऽनित्यः चाक्षुषत्वात्' इस संकीर्ण अनैकान्तिक स्थल में अव्याप्ति हो जायगी, कारण व्यतिरेकद्वय से उपलक्षित जो असिद्ध, उससे अत्यन्त भेद चाक्षुषत्व में नहीं है । किञ्च—व्यतिरेकद्वय से उपलक्षित व्यक्ति अनन्त हैं । अर्थात् सम्पूर्ण में अनुगत प्रतियोगितावच्छेदक धर्म नहीं है । अतः तत्प्रतियोगिक भेद का अवधारण अशक्य है, कारण प्रतियोगी के अनन्त होने से भेद भी अनन्त हैं। यदि कतिपय उपलक्षित व्यक्तियों से अन्यत्व का लक्षण में प्रवेश करें, तो कतिपय उपलक्षित सद्धेतु—आदि से अन्य होने से कतिपय सद्धेतु—आदि में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—साधारणत्व और असाधारणत्व एतत्-व्यक्तिद्वयोपलक्षितत्व ही अनुगत प्रतियोगिताच्छेदक धर्म है, अतः उक्त दोष नहीं है । खण्डन—उक्त व्यतिरेकद्वयो- पलक्षितस्वरूप धर्म व्यतिरेकद्वय में नहीं है । अतः उक्त व्यतिरेकद्वय का प्रतियोगिकोटि में प्रवेश न होने से व्यतिरेकद्वयोपलक्षितत्वावच्छिन्नप्रतियोगिक अभावरूप उक्त लक्षण की उक्त व्यतिरेकद्वय में अतिव्याप्ति हो जायगी । इसी प्रकार जिस पुरुष ने गोपद्वाच्य बाण आदि को नहीं देखा, उस पुरुष द्वारा प्रयुक्त गोपद्वाच्यत्व हेतु से बाण में विषाणित्व की अनुमिति उचित हो जायगी, कारण

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