खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 363, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण खण्डन ३४५ हेत्वाभासान्तरमप्येवं किं न समग्रहीति वासनायां यदेवानयोरितरेभ्यो वैधर्म्यं वाच्यम् , तस्यैव लक्षणस्य निर्वचनतापत्तेरिति । असिद्धत्वादिप्रकारादन्येन प्रकारेण हेत्वाभासोऽनैकान्तिक इति चेत् ; वाच्य- स्तर्हि स प्रकारः कस्यान्धथा, ततस्ततोऽन्यत्वं ज्ञेयम् । किञ्चैवं तर्हि असिद्धत्वादन्यदनैकान्तिकमिति कृत्वा विरुद्धादीनामनैकान्तिक- त्वेनैव सङ्ग्रहे शक्ये विरुद्धादिवद्रूपान्तरासङ्ग्राह्योः साधारणासाधारणयोरेव यदनेन प्रकारेण सङ्ग्रहमकार्षीस्तत्र नियतं रुचिरेव भवतो नियन्त्री । यदा च त्वमसिद्धादिव्यतिरिक्तान्याऽनैकान्तिकं लक्षयसि, तदाऽसिद्धादिभेदकं गोपदवाच्यत्वरूप हेतु अश्वादि विपक्ष में न होने से साधारण नहीं है तथा सपक्ष गौ में होने से असाधारण नहीं है । अतः साधारणत्व-असाधारणत्व-व्यतिरेकद्वय से उपलक्षित होने से तदन्यत्वरूप अनैकान्तिक नहीं है और प्रथम से विषाणित्व का निश्चय न होने से बाधित भी नहीं है । किञ्च--इसी प्रकार 'साधारणत्व-असाधारणत्व-असिद्ध-व्यतिरेक से उपलक्षित से अन्यत्व अनैकान्तिकत्व है' ऐसा लक्षणकर असिद्ध का भी अनैकान्तिक में संग्रह क्यों न माना जाय, ऐसी शंका होने पर साधारण, असाधारण में इतर ( विरुद्ध ) से वैलक्षण्य अवश्य कहना पड़ेगा । फिर तो वह वैलक्षण्य ही लक्षण क्यों न मान लिया जाय ? समर्थन—'असिद्धत्व आदि प्रकारों से अन्य प्रकार से जो हेत्वाभास हो, वह अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—वह प्रकार कहिये । यदि वह प्रकार न कहें, तो उसने अन्यत्व किसमें जाना जायगा ? किञ्च—'असिद्ध से अन्य हेत्वाभास अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षणकर विरुद्धादि का अनैकान्तिक रूप से संग्रह सम्भव होने पर भी विरुद्ध के तुल्य रूपान्तर ( अन्य लक्षण) से असंग्राह्य साधारण, असाधारण का ही जो संग्रह किया है, उसमें केवल आपकी रुचि ही प्रमाण है । किञ्च—जब आप 'असिद्धादि-व्यतिरिक्तत्व' अनैकान्तिक का लक्षण करते हैं, तो तो जबतक असिद्धादि का भेदक धर्म अर्थात् असिद्ध का लक्षण ज्ञात न हो, तबतक अन्यत्वघटित अनैकान्तिक का यह लक्षण भी नहीं बन सकता । और यदि असिद्धि आदि की निरुक्ति करें, तो उनके लक्षणों में पूर्वोक्त दोष भी प्राप्त होंगे । किञ्च—'स्मृति- व्यतिरिक्तत्वघटित अनुभव-लक्षण में कथित दोष भी होंगे । अर्थात् 'स्मृत्यन्यज्ञानत्वमनु- ४४