खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 364, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकारमनवगम्य तदन्यत्वमशक्याधिगममिति तदभिधाने प्रसक्ते तदाश्रया ये दोषा दर्शितास्तैः स्मृत्यतिरिक्तत्वोक्तदोषैश्च निराकर्त्तव्योऽसि । साध्येनाव्याप्यत्वे सति तदभावाव्याप्योऽनैकान्तिक इत्यपि न ; साध्याविशि- ष्टेऽपि गतत्वात् । विशेषणीभूतसाध्याव्याप्यत्वावगमाच्च प्राथमिकी व्याप्यत्वा- सिद्धिरेवोपजीव्या दूषणं स्यात् । विशेषणांशस्यैव चासाधकत्वसाधनसामर्थ्याद् व्यर्थविशेष्यताऽपि । वस्तुगतिव्यापकत्वमात्रपर्यवसायिनि तदभाववन्मात्रपर्यवसायिनि वा तत्काल- सन्दिग्धमानान्यतरव्यापकत्वे 'शब्दोऽनित्यः श्रोत्रविशेषगुणत्वादि'त्यादावसाधारणे व्यावृत्तत्वाच्च । वस्तुतः साध्याव्याप्ते तत्कालेऽपि च सत्प्रतिपक्षतया अनिर्धारित- साध्यव्याप्तिके प्रकरणसमे गतत्वाच्च । भवत्वम्' इस लक्षण में स्मृत्यन्यत्व स्मृत्यन्तर में भी है, इत्यादि जैसा खंडन किया गया है, वैसा ही यहाँ ना चाहिए । समर्थन—'साध्य का अव्याप्य होकर साध्याभाव का जो अव्याप्य हो, वह अनैकान्तिक है ।' यहाँ सद्धेतु में अतिव्याप्ति न हो, एतदर्थ साध्याव्याप्यत्व का निवेश है और विरुद्ध में अतिव्याप्ति न हो, इसलिए साध्याभावाव्याप्यत्व का निवेश है । खंडन—'शब्दोऽनित्यः अनित्यत्वात्' इस स्थल में जहाँ साध्य से अविशिष्ट ( अभिन्न ) अर्थात् साध्य ही हेतु है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यहाँ साध्याव्याप्यत्वरूप विशेषण का ज्ञान विशिष्ट अनैकान्तिक के ज्ञान का उपजीव्य है, अतः साध्याव्याप्यत्व- रूप प्राथमिक व्याप्यत्वासिद्धि को ही दोष मानिये, विशिष्ट को दोष मानना व्यर्थ है । किञ्च—जब विशेषणमात्र ही हेतु में असाधकत्व-साधन में समर्थ है, तो विशेष्य दल का उपादान भी व्यर्थ है। किञ्च—जहाँ पक्ष में व्यापक ( साध्य ) मात्र हो अथवा व्यापकाभावमात्र हो, परन्तु उस काल में सन्देह हो कि हेतु साध्य का व्याप्य है या साध्याभाव का व्याप्य, वहाँ 'शब्दोऽनित्यः श्रोत्रविशेषगुणत्वात्' इस असाधारण में अव्याप्ति हो जायगी । कारण यदि वह साध्य का अव्याप्य हो, तो साध्याभाव का अव्याप्य नहीं होगा । किञ्च—'शब्दोऽनित्यः पक्षसपक्षान्यतरत्वात्' इत्यादि स्थल में जहाँ वस्तुतः हेतु साध्य का अव्याप्य है, परन्तु उस काल में 'शब्दो नित्यः श्रोत्रग्राह्यत्वात्' यह सत्प्रति- पक्षित होने से साध्याव्याप्यत्व अनिर्धारित है, उस सत्प्रतिपक्ष में अतिव्याप्ति हो जायेंगी । कारण अज्ञानकाल में भी वस्तुतः साध्य का अव्याप्यत्व है ही ।