भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 610 में से

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पृष्ठ 365

परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३४७ एतेन—अनैकान्तिकः सव्यभिचार इति प्रत्युक्तं वेदितव्यम् । सव्यभिचार- स्योक्तप्रकाराधिकस्य निर्वक्तुमशक्यत्वादिति । सत्प्रतिपक्ष-लक्षण-खण्डनम् अपि चोक्तलक्षणविशेषणेन प्रमाणाव्यवच्छेदकादन्येन किं व्यवच्छेद्यम् ? केनचित् सत्प्रतिपक्षः केनचिदन्य इति चेत् ; कः पुनः सत्प्रतिपक्षः ? तथाहि—सत्प्रतिपक्षलक्षणमनुयुक्तो यद्याह, 'समानबलवोधितसाध्यविपर्य- यको हेतुत्वेनाभिमतः सत्प्रतिपक्षः' इति । तन्न ; तथाहि-- किमिह बलं १ विवक्षि- तम् ? सामर्थ्यमिति चेत्, तत् कुत्र कार्येऽभिमतम् ? न तावत् सर्वस्मिन्नेव कार्ये; सत्प्रतिपक्षहेत्वोर्भिन्नविषयबुद्ध्यादिजनकतया सर्वकार्ये समशक्तिकतया असम्भवात् । इससे 'सव्यभिचार अनैकान्तिक है' यह लक्षण खण्डित जानना चाहिए, कारण उक्त प्रकारों से अधिक सव्यभिचार के प्रकारों का निर्वचन हो नहीं सकता और उक्त सभी प्रकार खण्डित ही हैं । सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन अपिच—'असिद्ध-विरुद्ध-प्रकरणसम-कालात्ययापदिष्ट से अन्य हेत्वाभास अनैका- न्तिक है' इस पूर्वोक्त लक्षण में 'हेत्वाभास' विशेषण से तो प्रमाण ( सद्धेतु ) का व्यवच्छेद होता है, किन्तु अन्य विशेषणों के व्यवच्छेद्य क्या हैं ? यदि कहें कि किसीका सत्प्रतिपक्ष तो किसीके अन्य ( बाध आदि ) व्यवच्छेद्य हैं, तो सत्प्रतिपक्ष ही क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । फलतः व्यवच्छेद्य न होने से विशेषण व्यर्थ हैं । समर्थन—'जिस हेतु के साध्य का अभाव समान बल से युक्त प्रतिहेतु से बोधित हो, ऐसा जो हेतुत्वेन अभिमत हो वह सत्प्रतिपक्ष है' इस तरह उसका लक्षण कहा ही जा सकता है । खण्डन – यह ठीक नहीं है । देखिये – वहाँ बल क्या वस्तु है ? यदि कहें कि सामर्थ्य बल है, तो वह सामर्थ्य किस कार्य में है ? यदि कहें कि 'सब कार्यों में, तो वह युक्त नहीं। कारण सत्प्रतिपक्षित हेतु भिन्न-भिन्नविषयक स्वस्वसाध्य- विषयक बुद्धि के जनक होने से सब कार्यों में समान शक्तिवाले नहीं हैं। यदि कहें १. यहाँ 'बल' शब्द के दो अर्थ हैं—१. सामर्थ्य, जिसे मीमांसक 'शक्ति' कहते हैं और २. नैयायिकसम्मत योग्यता, जो पञ्चरूपादि रूप है । आरम्भ से सामर्थ्यरूप बल का खण्डन किया जा रहा है । आगे ही 'अथोप्यते' से नैयायिकसम्मत योग्यतारूप बल का खण्डन किया जायगा ।

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