भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 610 में से

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पृष्ठ 366

३४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

नापि यत्र क्वचित् कार्ये; प्रकृतसाध्यं प्रति प्रतीयमानासिद्धत्वादिदोषेणापि प्रमेयत्वप्रतिपादनादौ समर्थेन प्रतिहेतुना सत्प्रतिपक्षताप्रसक्त्या सर्वहेतूनां शक्य- करणसमहेत्वाभासत्वापत्तेः । नापि पूर्वहेतुसाध्याभावबोधनरूपे कार्ये, उत्तरहेतोरेवमसत्प्रतिपक्षत्वे स्वसाध्य- साधकतापत्तेः । प्रतिहेतोरिति चेन्न । तत्प्रतिहेतोरसामर्थ्यादेव समशक्तिकत्वानुपपत्तेः । इत्थमेव न हेतुसाध्यस्य विपर्ययबोधनेऽपि । अथोच्यते—स्वकीये स्वकीये प्रकृतसाध्ये यत् सामर्थ्यं पक्षसपक्षसत्त्वविपक्ष- व्यावृत्तत्वाबाधितविषयत्वलक्षणं तत् सत्प्रतिपक्षहेत्वोस्तुल्यम् । तदभिप्रायेणेदं सम- बलाभिधानम् । तेनेदमुक्तं भवति—पक्षसपक्षसत्त्वविपक्षव्यावृत्तत्वाबाधितविषयत्वै- स्तुल्येन बोधितसाध्यव्यतिरेकः सत्प्रतिपक्ष इति । कि जिस किसी कार्य में समानबल युक्त हों, तो प्रकृत साध्य के प्रति असिद्धत्व आदि दोष ज्ञात होने पर भी प्रमेयत्व-साधन में समान बल से युक्त प्रतिहेतु में भी सत्प्रति- पक्षत्व अतिव्याप्त होने से सभी हेतु सत्प्रतिपक्ष होने लगेंगे। समर्थन—'पूर्व हेतु का जो साध्य, उसके अभावरूप कार्य में समान बल से युक्त उत्तर हेतु से बोधित है, साध्याभाव जिस पूर्व हेतु का, वह सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—फिर तो उत्तर हेतु असत्प्रतिपक्षित होने से वह अपने साध्य का साधक होने लगेगा। समर्थन—'प्रतिहेतु का जो साध्य, उसके अभावरूप कार्य में समान बलयुक्त हेतु से जिस हेतु का साध्यविपर्यय बोधित हो, वह प्रतिहेतु सत्प्रतिपक्ष है।' पूर्व और उत्तर दोनों हेतु हैं तथा दोनों परस्पर प्रतिहेतु हैं, अतः उत्तर हेतु भी सत्प्रतिपक्षित हो जाता है। खण्डन—सत्प्रतिपक्ष स्थल में दोनों हेतुओं के परस्पर साध्याभावबोधनरूप कार्य व्यवस्थित हैं, अतः एक कार्य में दोनों का समान बल नहीं है। इसी प्रकार 'हेतु का जो साध्य, उसके अभाव के बोधनरूप कार्य में समान बलयुक्त प्रतिहेतु से बोधित है साध्य-विपर्यय जिसका, वह हेतु सत्प्रतिपक्ष है' यह लक्षण भी खण्डित जानना चाहिए । समर्थन—अपने-अपने प्रकृत साध्यरूप कार्य में पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व और अबाधितस्वरूप जो सामर्थ्य है, वह दोनों हेतुओं में तुल्य है, इसी अभिप्राय से समबलत्व का अभिधान किया गया है। इससे यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ कि 'पक्षसपक्ष- सत्त्व-विपक्षव्यावृत्तत्व-अबाधितत्वरूप बल जिनका तुल्य हो, ऐसे हेतुओं से बोधित हैं साध्यविपर्यय जिनके, वे हेतु सत्प्रतिपक्ष हैं ।'

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